इसी तरह 27 सप्ताह में जन्मे नवजात समेत रुद्रप्रयाग से रेफर होकर आए कई प्री-मैच्योर बच्चों का उपचार यहां किया गया। 28 सप्ताह में जन्मे जुड़वां बच्चों में एक की रास्ते में मौत हो गई जबकि दूसरे को उपचार के बाद स्वस्थ होने पर डिस्चार्ज किया गया।
बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो. सीएम शर्मा ने बताया कि 25 से 30 सप्ताह में जन्मे बच्चों के फेफड़े और अन्य अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते। ऐसे नवजातों को वेंटिलेटर सपोर्ट, विशेष दवाओं, पोषण और लगातार निगरानी की जरूरत होती है।
उन्होंने बताया कि निजी अस्पतालों में ऐसे उपचार पर 15 से 20 लाख रुपये तक खर्च हो सकते हैं जबकि बेस अस्पताल में पात्र मरीजों को सरकारी व्यवस्था के तहत उपचार मिल रहा है। प्राचार्य डॉ. सीएमएस रावत ने निक्कू वार्ड की टीम को बधाई दी।