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शिमला युग हत्याकांड : हिमाचल हाईकोर्ट ने सात साल बाद फांसी का फैसला पलटा, दो दोषियों को उम्रकैद, एक बरी

Tue, 23 Sep 2025 11:33 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला

सार

Yug Murder Case Shimla : हाईकोर्ट ने युग हत्या मामले में तीन दोषियों को मृत्यु दंड दिए जाने के जिला अदालत के फैसले को पलटते हुए दो को उम्रकैद में बदलने का फैसला सुनाया है।
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डिजाइन फोटो। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला के चर्चित युग हत्याकांड मामले में सात साल बाद बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने हैंडराइटिंग विशेषज्ञ की विरोधाभासी रिपोर्ट और फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए दो दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है जबकि एक को बरी कर दिया। बता दें कि 5 सितंबर 2018 को तीनों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, इसके बाद मामला पुष्टिकरण के लिए हिमाचल हाईकोर्ट भेजा गया था। मंगलवार को हिमाचल हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश राकेश कैंथला की खंडपीठ ने दोषी चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया। यह उम्रकैद उनके प्राकृतिक जीवन के अंतिम सांस तक रहेगी। खंडपीठ ने सबूत के अभाव में तीसरे दोषी तेजिंद्र पॉल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। फैसला 235 पन्नों पर आया है। दोषियों में दो युग के पड़ोसी हैं।

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हाईकोर्ट ने पाया कि विक्रांत बक्शी और चंद्र शर्मा के खिलाफ कठोर सबूत मिले हैं। विक्रांत के मोबाइल में युग की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग मिली, जिसमें वह आखिरी बार जीवित देखा गया था। यह रिकॉर्डिंग उस घर की थी, जिसे चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी ने किराये पर लिया था। अपहरण के दो साल बाद युग का कंकाल शिमला के भराड़ी स्थित क्लस्टन के पानी के टैंक से बरामद हुआ, जिसे चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी ने ही पुलिस को दिखाया था। तस्वीरें और वीडियो में जीवित देखे जाने के बाद युग का क्या हुआ, इसके बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। इसके आधार पर इन दोनों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है।

संदेह का लाभ देते हुए तेजिंद्र को किया बरी
हाईकोर्ट ने पाया कि तेजिंद्र पॉल के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं है। अदालत ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत दिया गया तेजिंद्र का बयान, जिसमें कथित तौर पर बच्चे को अपने गोदाम में रखने और गत्ते के डिब्बे में ले जाने में मदद करने की बात स्वीकार की थी, किसी भी बरामदगी का कारण नहीं बना। इस कारण उसके बयान का इस्तेमाल उसे दोषी ठहरने के लिए नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह साबित हुआ है कि तेजिंद्र ने अन्य आरोपियों से फोन पर बात की थी लेकिन केवल कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि फोन पर क्या बातचीत हुई थी, तब तक केवल फोन कॉल से अपराध में उसकी संलिप्तता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

मौत की सजा तभी दी जा सकती है जब सुधार की कोई गुंजाइश न हो
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कानून के अनुसार किसी भी दोषी को मौत की सजा तभी दी जा सकती है जब सुधार की कोई गुंजाइश न हो। मामले में दोषियों को लेकर अलग-अलग विभागों की ओर से दी गई रिपोर्टों को रिकॉर्ड पर लिया गया। पुलिस, जेल प्रशासन और मनोचिकित्सा विभाग की ओर से सौंपीं रिपोर्ट के अनुसार दोषी चंद्र शर्मा और विक्रांत बक्शी का व्यवहार जेल में सामान्य और संतोषजनक रहा। उनमें किसी भी प्रकार की मानसिक या मनोवैज्ञानिक बीमारी के कोई लक्षण नहीं पाए गए। अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि युग को बेरहमी से मारा गया था या उसे पानी की टंकी में जिंदा फेंका गया था। जब तक यह साबित नहीं हो जाए कि दोषी सुधार योग्य नहीं है तब तक उन्हें मौत की सजा देना सही नहीं है। अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए वह दोषियों के प्रति आक्रोशित है, लेकिन सबूतों और कानून के दायरे में रहते हुए वह मौत की सजा की पुष्टि नहीं कर सकती।

फैसले आहत पिता बोले, सुप्रीम कोर्ट में करेंगे अपील
प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले पर युग के पिता विनोद गुप्ता ने हैरानी जताई है। नम आंखों से पिता ने कहा कि पिछले 11 वर्षों से हम अपने बेटे के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिला अदालत ने इस मामले में तीनों दोषियों को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई थी लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि उच्च न्यायालय ने दो दोषियों की सजा कम करके उम्रकैद और एक को बरी करने का फैसला लिया है। फैसले से वह और उनका परिवार आहत है। हम इस फैसले से असंतुष्ट हैं और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। पिता ने कहा कि कोर्ट का फैसले आने की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।

यह है मामला
शिमला के राम बाजार के विनोद गुप्ता के 4 वर्षीय बेटे युग गुप्ता को 14 जून 2014 को किडनैप किया गया था। सीआईडी जांच के अनुसार, आरोपी उसे राम चंद्रा चौक के पास एक किराये के मकान में ले गए। जहां उन्होंने युग को तरह-तरह की यातनाएं दीं। हफ्ते भर मासूम को तड़पाने के बाद आरोपियों ने उसे भराड़ी में एमसी के पेयजल टैंक में जिंदा ही फेंक दिया। 22 अगस्त 2016 को विक्रांत बख्शी की निशानदेही पर सीआईडी ने टैंक के अंदर और बाहर से युग ही हड्डियां बरामद कीं। उसके बाद राम बाजार के चंद्र शर्मा और तेजेंद्र पाल को गिरफ्तार किया। 25 अक्तूबर 2016 को मामले में सभी तरह के साक्ष्य जुटाकर सीआईडी ने कोर्ट में पहली चार्जशीट पेश की। उसके बाद दो और सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी पेश की गई। कुल मिलाकर सीआईडी ने पूरे मामले में 2300 पन्नों की चार्जशीट कोर्ट में पेश की। ट्रायल में 100 से अधिक गवाहों की गवाही समेत अन्य साक्ष्य के आधार पर पांच सितंबर को जिला अदालत ने तीनों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई।
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युग हत्याकांड टाइमलाइन...
  • 14 जून 2014 को राजधानी शिमला के कारोबारी विनोद गुप्ता के चार साल के बेटे युग का फिरौती के लिए अपहरण हुआ।
  • 23-24 जून की रात अभियोजन के अनुसार हत्यारों ने युग को पत्थर से बांधा और कलस्टन पेयजल टैंक में फेंक दिया।
  • अपहरण के बाद पुलिस ने जांच शुरू की, लेकिन गुत्थी सुलझाने में नाकाम रही, परिजनों ने जांच पर सवाल उठाए।
  • पुलिस की नाकामी के बाद मामला सीआईडी को सौंपा गया। सीआईडी जांच में ही पूरे मामले का खुलासा हुआ।
  • 20 अगस्त 2016 को अपहरण के दो साल बाद सीआईडी ने एक आरोपी विक्रांत को गिरफ्तार किया।
  • 22 अगस्त 2016 को विक्रांत की निशानदेही पर सीआईडी ने कलस्टन पेयजल टैंक से युग का कंकाल बरामद किया।
  • इसी दिन इसके साथी चंद्र शर्मा और तेजेंद्र पाल को भी गिरफ्तार किया गया।
  • इतने महीनों तक कंकाल टैंक में ही रहा और संबंधित इलाकों में इसी टैंक से पानी की आपूर्ति भी होती रही
  • 25 अक्तूबर 2016 को सीआईडी ने जिला एवं सत्र न्यायालय में आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया।
  • 20 फरवरी 2017 को अपहरण और हत्या के मामले का ट्रायल शुरू हुआ।
  • 27 फरवरी 2018 तक जिला एवं सत्र न्यायालय में ट्रायल चला।
  • पांच सितंबर 2018 को तीनों आरोपियों को सजा ए मौत की सजा सुनाई गई।
  • 11 अगस्त को हाईकोर्ट ने युग हत्या मामले में दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।
  • 23 सितंबर को हाईकोर्ट ने तीन दोषियों को मृत्यु दंड के जिला अदालत के फैसले को पलटते हुए दो को उम्रकैद में बदलने और एक आरोपी को बरी कर दिया।
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