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Himachal: हिमखंड टूटने का पहले ही मिल जाएगा अलर्ट, कर सकेंगे बचाव, यहां लगेगा पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम

Wed, 01 Oct 2025 10:30 AM IST
Krishan Singh अशोक राणा, संवाद न्यूज एजेंसी, केलांग(लाहौल-स्पीति)।

सार

प्रदेश में पहली बार किसी ग्लेशियर झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने जा रहा है। 
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घेपन झील में स्थापित होगा अर्ली वार्निंग सिस्टम । - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश में पहली बार किसी ग्लेशियर झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने जा रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इस पायलट प्रोजेक्ट को लाहौल घाटी की घेपन झील में शुरू करने जा रहा है। प्रोजेक्ट पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग और लाहौल-स्पीति प्रशासन संयुक्त रूप से काम करेंगे। यह अत्याधुनिक सिस्टम झील में हिमखंड टूटने या ज्यादा पानी भरने की स्थिति में खतरे का संकेत पहले ही उपलब्ध करवाएगा। इससे ग्लेशियर और झील फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी संभावित आपदाओं से निपटने की तैयारी समय रहते हो सकेगी। इसरो ने पहले ही कई ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील सूची में डाला है। घेपन झील भी इस सूची में शामिल है।

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अब यहां लगने वाला यह सिस्टम भविष्य में आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। घेपन झील समुद्र तल से 13,615 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी गहराई 100 मीटर से अधिक मानी जाती है। झील के चारों ओर ऊंचे बर्फीले पहाड़ और ग्लेशियर हैं। लगातार जलवायु परिवर्तन और बर्फ पिघलने से इसका आकार हर साल बढ़ रहा है। अगर यह झील टूटी तो पानी सीधे चंद्रा नदी में जाएगा और लाहौल के कई गांवों के साथ-साथ मनाली-लेह हाईवे और अटल टनल मार्ग को भी नुकसान पहुंचा सकता है। उपायुक्त किरण भड़ाना ने बताया कि विशेषज्ञों और तकनीकी टीम ने हाल ही में घेपन झील का दौरा किया है। जल्द ही यहां हिमाचल का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। सिस्टम सैटेलाइट की मदद से काम करेगा और मौसम विभाग, प्रशासन को आपदा की पूर्व सूचना उपलब्ध कराएगा। 
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यह है अर्ली वार्निंग सिस्टम...
अर्ली 
वार्निंग सिस्टम एक ऐसी तकनीक या व्यवस्था होती हैं, जिसका उद्देश्य किसी संभावित प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना या खतरे के बारे में समय रहते लोगों और प्रशासन को सचेत करना है। इसका मकसद जानमाल की हानि को कम करना है। सेंसर, रडार, सैटेलाइट, मौसम केंद्र या अन्य उपकरणों से लगातार जानकारी एकत्र की जाती है।
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