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अलविदा 2018: गर्मियों में देश-दुनिया में गूंजा शिमला का ये मुद्दा

Fri, 28 Dec 2018 05:02 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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साल 2018, नगर निगम शिमला के लिए यह साल भीषण पेयजल संकट और भाजपा पार्षदों की आपसी लड़ाई के लिए याद रखा जाएगा। मई-जून में शहरवासियों को भीषण पेयजल संकट झेलना पड़ा।

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हालत यह थी कि कार्ट रोड से लेकर माल रोड तक पानी के लिए बर्तन उठाए लोगों की कतारें लग गईं। देश-विदेश के सैलानियों ने शहर की ऐसी हालत देखी। पानी के लिए शहर भर में प्रदर्शन हुए जिसमें पार्षदों समेत 350 से ज्यादा लोगों पर मुकदमे दर्ज हुए।

आखिर सरकार और प्रदेश हाईकोर्ट को व्यवस्था संभालनी पड़ी, तब जाकर जनता को राहत मिली। संकट के समय मेयर का चीन दौरा भी विवादों में रहा। यह साल भाजपा पार्षदों की आपसी लड़ाई का भी गवाह बना।
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एक समय पार्षद अपनी ही मेयर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने को तैयार हो गए थे। प्रस्ताव तो नहीं आया, लेकिन आयुक्त समेत कई अफसरों के अचानक तबादले हो गए।

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इन फैसलों से सालभर चर्चा में रहा निगम

-पेयजल व्यवस्था कंपनी के हवाले की गई। पानी की दरें और कूड़ा शुल्क भी बढ़ाया गया।
-आरएसएस से जुड़ी संस्थाओं को जमीन देने पर निगम गरमाया रहा। जनता को ऑनलाइन सेवाएं नहीं मिलीं।
-टाउनहाल लेने के निगम ने काफी प्रयास किए। लेकिन साल के अंत तक निराशा ही मिली। टूटीकंडी पार्किंग मिली।
-एक कॉल पर मिलीं अनेकों सेवाएं। वार्डों में वाटर एटीएम लगे। नए एंबुलेंस रोड, पार्क और पार्किंग बनाए गए।
-लीकेज रोकने के लिए कोटी बरांडी, गुम्मा परियोजनाओं के पाइप बदले। साफ पानी के लिए यूवी ट्रीटमेंट प्लांट लगे।
-सतलुज वाटर प्रोजेक्ट को विश्वबैंक से मंजूरी मिली। साल के अंत में दुकानों का किराया बढ़ाया गया।
-सितंबर में सांगटी पार्षद मीरा ने दिया इस्तीफा। स्मार्ट सिटी का काम लटका। अम्रुत के तहत कई पार्किंगों की योजनाएं तैयार हुईं।
-स्वच्छता रैकिंग में शिमला को मिला 144 रैंक। पहली बार शहर में गीला-सूखा कचरा अलग उठाने की योजना लागू की गई।
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