भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास शिमला ने गुरुवार को दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर में 24वें राधाकृष्णन स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया। इसमें नोबेल पुरस्कार विजेता 14वें तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने यूनिवर्सल एथिक्स विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि आज विश्व को पारंपरिक भारतीय ज्ञान में उल्लेखित करुणा की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। अहिंसा इस विश्व को कष्टों से उबार सकती है। भले ही आधुनिक विज्ञान ने आज चाहे जितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन जब बात अंतर्मन की शांति और आध्यात्मिकता की आती है तो केवल भारतीय ज्ञान ही मानव जीवन और आत्म से जुड़े इन विषयों पर हमारा मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
दलाईलामा ने कहा कि हमें अपने जीवन में आलोचनाओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। बौद्ध धर्म और भारतीय ज्ञान हमें इसी की शिक्षा देता है। उन्होंने प्राची भारतीय ज्ञान परंपरा, करुणा, आध्यात्मिकता को न केवल धार्मिक रूप से बल्कि अकादमिक रूप से भी पढ़ाए जाने की बात की। दलाईलामा ने वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी, प्राचीन भारतीय ज्ञान, आध्यात्मिकता, आधुनिक जीवन की जटिलताओं से जुडे़ प्रश्नों के उत्तर भी दिए। आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने अपने अभिभाषण में अध्यात्मिक लोकतंत्र के साथ उभरते हुए नैतिक विश्व, पर्यावरणीय न्याय, नैतिक अर्थशास्त्र में समग्रता के संतुलन जैसे विषय पर जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि नैतिकता केवल सामाजिक विज्ञान नहीं होता, जहां केवल सैद्धांतिक बातें की जाती हो। संस्थान के अध्यक्ष प्रो. कपिल कपूर ने कहा कि अहिंसा, करुणा और दया भारतीय चेतना प्रकृति का मौलिक गुण है। आईआईएएस शासकीय निकाय के उपाध्यक्ष प्रो. चमन लाल गुप्ता ने दलाईलामा एवं आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे का परिचय दिया। निदेशक प्रो. मकरंद परांजपे ने स्वागत प्रस्ताव रखा गया। इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के अध्येता एवं अधिकारी भी मौजूद रहे।