हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की ओर से वर्ष 2009-2010 और 2011-2012 के लिए भरी गई रिवाइज्ड रिटर्न का पुन: आंकलन करने बारे डिप्टी इनकम टैक्स कमिश्नर शिमला के भेजे गए नोटिस पर स्थगन आदेश दिए हैं।
न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर की खंडपीठ ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया कि इस नोटिस पर आगामी कार्यवाही अमल में नहीं लाई जाएगी। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त नोटिस अधिनियम में दिए प्रावधान के अनुरूप जारी नहीं किया गया है।
प्रार्थी ने दलील दी है कि नोटिस कानूनन गलत है, क्योंकि कृषि आय पर इनकम टैक्स अधिनियम में टैक्स लगाने पर छूट है। प्रार्थी ने यह भी आरोप लगाया है कि उक्त नोटिस डिप्टी इनकम टैक्स कमिश्नर शिमला की ओर से भेजा गया है जबकि अधिनियम के तहत किया गया आंकलन इनकम टैक्स कमिश्नर की ओर से पूरा किया गया है, जिसका पुन: आंकलन ओहदे में छोटा अधिकारी नहीं कर सकता। खंडपीठ ने इनकम टैक्स विभाग से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है।
भ्रष्टाचार केस: कोर्ट ने नियुक्त किए न्याय मित्र
वहीं मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक दुराचार से जुड़ी याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने वीरवार को दो न्याय मित्रों को नियुक्त किया। अदालत को तय करना है कि यह याचिका विचारयोग्य है या नहीं। मुख्य न्यायाधीश जी रोहिनी और न्यायमूर्ती राजीव सहाय की पीठ ने याचिका दायर करने वाले गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज को इस मामले से अलग करते हुए अदालत की मदद के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन और सिद्धार्थ अग्रवाल को न्याय मित्र नियुक्त किया।
अदालत ने यह आदेश वीरभद्र सिंह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की इस दलील के बाद दिया कि याचिका दायर करने वाली संस्था के वकील प्रशांत भूषण और वीरभद्र के बीच पहले से बैर है। कॉमन कॉज संस्था ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर अनुरोध किया था कि अदालत की देखरेख में सीबीआई और आयकर विभाग को वीरभद्र सिंह के खिलाफ कालेधन व भ्रष्टाचार आरोपों की जांच करने का निर्देश दिया जाए।