हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह अपने जीवन को हमेशा खुली किताब बताते थे। वह हिमाचल प्रदेश के सर्वाधिक अनुभवी नेता थे और पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को राजनीतिक गुरु मानते थे। नेहरू ने ही उन्हें राजनीति में भी लाया। इस बात को वीरभद्र सिंह बार-बार दोहराते थे। उसके बाद वह इंदिरा गांधी, मनमोहन सरकार आदि में भी केंद्र में प्रमुख भूमिकाओं में रहे। 23 जून, 1934 को सराहन में जन्में वीरभद्र सिंह अपने पिता राजा पद्म सिंह के बाद बुशहर रियासत के अगले वारिस थे। इसीलिए उनके समर्थक उन्हें राजा साहब नाम से संबोधित करते थे।
हिमाचल में सबसे अधिक छह बार मुख्यमंत्री बनने का रिकाॅर्ड उन्हीं के नाम दर्ज है। 1983 से 1985 पहली बार, फिर 1985 से 1990 तक दूसरी बार, 1993 से 1998 में तीसरी बार, 1998 में कुछ दिन चौथी बार, फिर 2003 से 2007 पांचवीं बार और 2012 से 2017 छठी बार मुख्यमंत्री बने। वह पिता राजा पद्म सिंह के बाद बुशहर रियासत के अगले वारिस बने। 13 साल की उम्र में उनका राज्यभिषेक हुआ था। वीरभद्र सिंह को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राजनीति में लाया था। वह महासू सीट से 1962 में लोकसभा के लिए चुने गए। बाद में वह इंदिरा सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री बने तो मनमोहन सरकार में कैबिनेट मंत्री नियुक्त हुए। उनके पास केंद्रीय इस्पात मंत्रालय रहा और वह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री भी रहे।
वर्ष 1983 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ठाकुर रामलाल को हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। वह 1983 से 1985 में पहली बार, 1985 से 1990 तक दूसरी बार, 1993 से 1998 में तीसरी बार, 1998 में कुछ दिन चौथी बार, फिर 2003 से 2007 पांचवीं बार और 2012 से 2017 छठी बार मुख्यमंत्री बने। लोकसभा के लिए वीरभद्र सिंह 1962, 1967, 1971, 1980 और 2009 में चुने गए।
उल्लेखनीय है कि वर्तमान में वीरभद्र सिंह सोलन जिला के अर्की विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक थे। वीरभद्र सिंह परंपरागत सीट रोहडू से विधानसभा चुनाव लड़ते थे। अपने घर रामपुर की सीट के आरक्षित होने के कारण वह कभी भी यहां से चुनाव नहीं लड़ पाए। पुनर्सीमांकन के चलते रोहडू़ सीट भी आरक्षित हुई तो 2012 में उन्होंने शिमला ग्रामीण सीट से चुनाव लड़ा। 2017 में उन्होंने यह सीट अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह के लिए सीट छोड़ दी और उन्होंने खुद अर्की से चुनाव लड़ा।
कभी कांग्रेस नहीं छोड़ी, अपनी शर्तों पर की हिमाचल में सियासत
वीरभद्र सिंह ने कभी भी कांग्रेस नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी शर्तों पर ही हिमाचल प्रदेश में सियासत की। अपनी बात मनवाने के लिए वह हाईकमान के समक्ष अड़ जाते थे। वर्ष 2012 के चुनाव से पहले वह विधानसभा चुनाव की कमान अपने हाथों में लेने के लिए हाईकमान को झुकाने में कामयाब हुए। उस दौरान चर्चा रही कि वह कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में जा सकते हैं। हालांकि, यह महज चर्चा ही साबित हुई। उनके समर्थकों ने उस वक्त दिल्ली में डेरा डाले रखा।
ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की जांच झेली, कभी विचलित नहीं हुए
वीरभद्र सिंह ने मुख्यमंत्री रहते अपने पिछले शासनकाल में ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की जांच भी झेली। उन्हें लगातार नई दिल्ली के चक्कर काटने पड़े। बावजूद इसके कभी अपने राजनीतिक लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। वीरभद्र इन्हें राजनीतिक रंजिश से बनाए गए मामले बताते रहे। वीरभद्र सिंह ने खुद को हमेशा फाइटर की तरह ही पेश किया।