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फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए गांव वालों ने निकाली गजब की तकनीक

Sun, 14 Aug 2016 06:43 PM IST
सुरेश शांडिल्य /अमर उजाला, शिमला
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मटर, गोभी, शिमला मिर्च, मक्की, उड़द और मसूर दाल जैसी फसलों के आसपास अब जंगली जानवर नहीं फटक पा रहे। यह कोई मजाक नहीं है। जंगली जानवरों से खेतों और बागों को बचाने में जब सरकारें नाकाम रहीं तो किसानों ने खुद ही देसी उपाय कर ‘उपला टाइम बम’ बना दिया। गोबर से बने उपले में पटाखे जोड़कर रात भर धमाके किए जा रहे हैं। यह तकनीक बखूबी काम कर रही है। एक गांव से ईजाद इस तकनीक को अब कई गांवों के किसानों ने अपना लिया है।
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फिलहाल इस तकनीक का इस्तेमाल सोलन की कंडाघाट तहसील की पौधना ग्राम पंचायत के रनहोग, पपलोग, सलाना, पलाह और शिमला से सटे शोघी के सरी, धार थलक, नाल थलक और सूरो आदि गांवों के किसान कर रहे हैं। उधर, कृषि मंत्री सुजान सिंह पठानिया ने बताया कि वह इस तकनीक पर जानकारी हासिल करेंगे। इस तकनीक की उपयोगिता पर मंथन किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि हिमाचल विधानसभा में बड़ी बहसों से लेकर दिल्ली में संसद तक जंगली जानवरों से खेती चौपट होने का मामला कई बार गूंजा। मनरेगा में राखे रखवाने जैसे प्रस्ताव भी बने लेकिन कुछ नहीं हुआ। जंगली जानवरों से फसलों को बचाने के समाधान खोजने में भले ही सरकारें फेल हो गई हों लेकिन अब किसानों ने अपने स्तर पर एक देसी प्रयोग में सफलता पाकर कुछ राहत जरूर हासिल की है।
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ऐसे काम करता है ‘उपला टाइम बम’

यह खोज सोलन जिले के कंडाघाट की पौधना पंचायत के रनहोग गांव में हुई। गोबर के लंबे सूखे उपले में पटाखे बीन दिए जाते हैं। खेत में उपले में आग लगा दी जाती है। उपलों में धीमी आग सुलगती रहती है, जिसके बाद समय-समय पर धमाके होते रहते हैं। ये उपले बारिश से बचाने को छत वाले छोटे-छोटे घरौंदों या मौसम साफ होने पर खुले में रखे जाते हैं।

ये आठ-दस मिनट से लेकर आधे-पौने घंटे बाद फटते रहते हैं। इनके फटने से घबराकर जंगली सुअर और अन्य जानवर खेतों-बगीचों से भाग जाते हैं। एक उपला दो से तीन घंटे तक सुलग सकता है। इससे जोड़ा गया दूसरा उपला पहले वाले उपले से आग पकड़कर आगे सुलगता रहता है।

जयगोपाल ने ईजाद की थी यह तकनीक
सोलन जिले की कंडाघाट तहसील की ग्राम पंचायत पौधना के गांव रनहोग के निवासी शंकर दत्त अत्री ने बताया कि इस तकनीक को उन्हीं के गांव में एक किसान जयगोपाल ने ईजाद किया था। उनका देहांत हो चुका है।
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