रविवार को राजधानी शिमला में प्रेस वार्ता करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अब वित्त आयोग ने स्पष्ट किया है कि निरंतर अनुदान के बजाय राज्यों को राजस्व बढ़ाने और व्यय अनुशासन अपनाने की दिशा में बढ़ना होगा। वित्तीय घाटा आय और व्यय के अंतर का विषय है और इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों से ठीक किया जा सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि हिमाचल का कर्ज-जीडीपी अनुपात 40 फीसदी से ऊपर पहुंचना सावधानी का संकेत है और राज्य को दीर्घकालिक वित्तीय अनुशासन की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने वित्त आयोग के नए फॉर्मूले के तहत कर हिस्सेदारी में संरचनात्मक वृद्धि की है, जिससे हिमाचल जैसे राज्यों को अधिक हिस्सा मिल रहा है और इससे आरडीजी घटने के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है, बशर्ते राज्य वित्तीय प्रबंधन मजबूत करें। प्राकृतिक आपदाओं के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने एसडीआरएफ और एनडीआरएफ फंड में पिछले वर्षों में कई गुना वृद्धि की है और राज्यों को न केवल राहत बल्कि प्रिवेंटिव उपायों पर भी खर्च की अनुमति दी गई है। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में आपदा-पूर्व तैयारी पर अधिक निवेश किया जाए।