प्रदेश में नेत्रदान को लेकर यही उदासीनता रही तो खराब कार्निया के कारण दृष्टिहीन करीब 3500 लोगों को आंखों की रोशनी देने में 200 साल से अधिक समय लगेगा। वह भी तब, जब दृष्टिहीनों की संख्या बढ़ने से रोक दी जाए।
सरकारी स्तर पर उदासीनता के कारण लोग मृत्यु के बाद नेत्रदान की इच्छा पूर्ण नहीं कर पाते। यह बात उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा की पूर्व संध्या पर प्रेस वार्ता के दौरान दी। यह पखवाड़ा 25 अगस्त से 8 सितंबर तक चलेगा।
उन्होंने कहा कि आईजीएमसी अस्पताल में खुले नेत्र बैंक में चार सालों में 36 लोगों से दान में 72 कार्निया मिली। इनमें से 59 कार्निया को प्रत्यारोपित किया गया। इस नेत्र बैंक में 149 दृष्टिहीन के नाम दर्ज हैं, जिन्हें कार्निया लगाकर रोशनी दी जा सकती है।
579 लोगों ने नेत्रदान के लिए संकल्प पत्र जमा किए हैं। उमंग फांउडेशन की मांग को लेकर सरकार ने टांडा मेडिकल कॉलेज में नेत्र बैंक खोलने के लिए मई 2012 में 15 लाख मंजूर किए। बावजूद इसके आज तक नेत्र बैंक नहीं खुला। हर जिला मुख्यालय पर नेत्र संग्रह केंद्र खोले जाने चाहिए।
शिमला के नेत्र बैंक में नेत्रदान कम होने का एक बड़ा कारण सोशल वर्कर का न होना है जो अस्पताल में कोई मृत्यु होने पर उसके परिजनों को नेत्रदान के लिए राजी कर सके।
शिशुपाल को रोशनी का इंतजार
शिशुपाल की उम्र 20 साल है। ये रामपुर के रहने वाले हैं। संजौली कालेज में प्रथम वर्ष के स्टूडेंट। इनका कार्निया बदलना है। उसके बाद ये दुनिया को अपनी आंखों से देख पाएंगे।
आईजीएमसी अस्पताल के नेत्र बैंक में 2010 में इन्होंने कार्निया के लिए पंजीकरण कराया है लेकिन आज तक नंबर नहीं आया। नेत्र बैंक के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण ऐसे कई शिशुपाल अंधकार में जीने को मजबूर हैं।