न्यू शिमला की सीबीआई विशेष अदालत ने एनडीपीएस एक्ट के मामले में दो युवकों को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि पुलिस आरोपों को उचित साक्ष्य और गवाही से साबित करने में विफल रही। इससे पुलिस की जांच प्रक्रिया पर प्रश्न उठे हैं।
सीबीआई अदालत की टिप्पणी, साक्ष्य साबित करने में पुलिस विफल
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754 ग्राम चरस, 842 ग्राम अफीम पोस्त बरामदगी के थे आरोप 16 अप्रैल 2016 को न्यू शिमला थाना में दर्ज हुआ था मामला दीपक मेहता
शिमला। सीबीआई की विशेष अदालत ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो युवकों को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ठोस गवाही और पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा है। साथ ही पुलिस प्रतिबंधित पदार्थ की कथित बरामदगी और साजिश रचने तथा साक्ष्य मिटाने के आरोपों को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर पाई। यह मामला 16 अप्रैल 2016 को न्यू शिमला थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ था। पुलिस की टीम राष्ट्रीय राजमार्ग-05 पर न्यू शिमला, पंथाघाटी और मल्याणा क्षेत्र में गश्त पर थी। पुलिस का दावा था कि पंथाघाटी के पास एक कार की तलाशी पर आरोपी अर्जुन ठाकुर (शिमला ग्रामीण) से 920 ग्राम चरस और 842 ग्राम अफीम पोस्त बरामद की गई। जांच के दौरान अर्जुन ने बताया कि यह सामग्री हरियाणा निवासी प्रदीप कुमार ने दी थी, उसे प्रतिबंधित सामग्री ऊंची कीमत पर बेचने के लिए कहा था। इसी आधार पर पुलिस ने प्रदीप कुमार को भी सह-आरोपी बनाया। इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस की धारा 20, 29, 201 और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मामला पंजीकृत कर जांच की।
अभियोजन पक्ष ने मामले को साबित करने के लिए पुलिस सहित 19 गवाहों के बयान पेश किए। लेकिन सीबीआई के विशेष न्यायाधीश डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा ने पाया कि गवाहों और साक्ष्यों से पेश किए गए सबूत आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों पर लगाए गए अपराध को सभी उचित संदेहों से परे साबित करने में विफल रहा है। इसी आधार पर दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया। संवाद
अभियोजन का पक्ष अभियोजन ने दलील दी कि 16 अप्रैल 2016 की सुबह करीब 3:45 बजे पुलिस टीम ने विजय नगर (एनएच) पर नाकाबंदी ड्यूटी के दौरान एक कार को रोका। तलाशी के दौरान गाड़ी की डिक्की से 920 ग्राम चरस बरामद होने का दावा किया गया। आरोपी अर्जुन ठाकुर वाहन का कोई लाइसेंस या परमिट भी प्रस्तुत नहीं कर सका। पुलिस का आरोप था कि यह चरस उसे सह-आरोपी प्रदीप कुमार ने दी थी जिसे ऊंचे दामों पर बेचने और मुनाफे में कमीशन देने की योजना बनाई थी। इसके अलावा दोनों आरोपी मोबाइल कॉल, चैट और एसएमएस के माध्यम से लगातार संपर्क में थे। विशेषज्ञ की रिपोर्ट के आधार पर अर्जुन ठाकुर के मोबाइल फोन से इसकी पुष्टि हुई। वहीं प्रदीप कुमार पर आरोप है कि उसने खुद को बचाने के लिए अपना मोबाइल फोन और सिम कार्ड नहर में फेंक दिया, ताकि सबूत मिट जाएं।