अब चीड़ के पेड़ों की छाल उतारे बगैर आला दर्जे का तारपीन हासिल किया जाएगा। इससे न तो पेड़ पर कोई असर पड़ेगा और न ही तारपीन हासिल करने के लिए लंबी अवधि तक इंतजार की जरूरत रहेगी। बढ़िया किस्म का तारपीन हासिल कर बाजार में अच्छा-खासा मुनाफा भी कमाया जा सकता है। इस विधि के उपयोग से चीड़ के पेड़ों को संरक्षण भी मिलेगा।
गौरतलब है कि चंबा, कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी व बिलासपुर सहित अन्य जगहों पर चीड़ के घने जंगल मौजूद हैं। जिन्हें तारपीन के लिए लगाया गया था। लेकिन तरीका सही न होने की वजह से इन पेड़ों से उच्च गुणवत्ता का तारपीन हासिल नहीं हो पाया। इसका असर पेड़ों की पैदावार पर भी पड़ा है और अब चीड़ के यह जंगल सिर्फ सूखे मौसम में आग लगने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। लेकिन नौणी विवि की नई खोज के बाद इन पेड़ों की अहमियत बढ़ जाएगी।
डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हार्टीकल्चर एंड वानिकी नौणी में यह नई तकनीक तैयार की गई है, जिसे बोरहोल का नाम दिया गया है। नई विधि में ड्रिलिंग के छोटे छेद (1 इंच चौड़े और 4 इंच गहरे) शामिल हैं, जिससे इसकी रेजिन नलिकाओं को खोलने के लिए पेड़ में सरल औजारों का प्रयोग किया जाता है। छेद को खोलने की ओर थोड़ी ढलान के साथ ड्रिल किया जाता है। रेजिन कलेक्शन के लिए टाई की सहायता से स्पॉड्स को पालीथिन बैग के साथ खोलने में लगाया जाता है।
यूएचएफ विभाग के वन उत्पाद के प्रमुख डॉ कुलवंत राय ने बताया कि नई तकनीक को अन्य परंपरागत तरीकों की कुछ सीमाओं पर काबू पाने के प्रयास में विकसित किया गया था। इस विधि का एक प्रमुख विशेषता यह है कि एक बंद संग्रहण तंत्र रेजिन एसिड के समय से पहले मजबूती को रोकता है। इससे छह महीने तक की विस्तारित अवधि के लिए ओलेरेसिन प्रवाह को बनाए रखता है।