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पशु बलि पर रोक, अब ऐसे निभाएंगे प्रथा

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पशु बलि पर रोक के फैसले को सदियों पुराने देवी मां मंदिर धरेच की कमेटी ने भी समर्थन दे दिया है। जैईश्वरीय देवी मां के इस मंदिर में सदियों से हर वर्ष कई आयोजनों में बकरों की बलि दी जाती रही है लेकिन अब नारियल फोड़कर इस प्रथा को निभाया जाएगा।
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मंदिर के भंडारी लच्छी राम ने बताया कि भूंडा, शांद व जागरा जैसे बडे़ कार्यक्रमों के अलावा सूतक-पातक के समय बलि की प्रथा आम है। भूंडा यज्ञ का आयोजन मंदिर परिसर में 12 वर्ष बाद होता है। पूरे क्षेत्र की जनता इस कार्यक्रम में एकत्रित होकर मंदिर आती है। देवी मां की पालकी को देवता के गूर आम जनता के बीच सुखद जीवन का आशीर्वाद देने के लिए लाते हैं।
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जागरा में कटते हैं सात से आठ बकरे

चार से पांच दिन के इस भूंडा के दौरान सौ से अधिक बकरे कटते थे। हर अठारह से बीस साल के बाद देवी मां को स्नान के लिए कांगड़ा के नगरकोट ले जाया जाता है। इस सफर को पैदल तय किया जाता है। हर परिवार का एक सदस्य इस मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। देवी मां के घर वापसी पर पच्‍चीस से तीस बकरे काटे जाते हैं।

देवी मां के विशेष कार्यक्रम जागरा में सात से आठ बकरे काटे जाते हैं। जागरा के इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन गांव के किसी भी व्यक्ति के घर में किया जाता है। कहा जाता है कि देवी मां से की गई मनोकामना पूरी होने पर इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
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