हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनहित से जुडे़ मामले की प्रशासनिक ट्रिब्यूनल सुनवाई करने का क्षेत्राधिकारी नहीं है। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने अनिल वर्मा और अन्यों की याचिकाओं को मंजूर करते हुए यह फैसला सुनाया।
याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनाए निर्णय के तहत पीरियड आधार पर कार्य करने वाले अध्यापकों और लेक्चरर को नियमित करने या अनुबंध पर लाने के लिए सरकार को निर्देश दिए थे।
सरकार ने इन आदेशों के तहत 3 अक्तूबर, 2015 को अधिसूचना जारी की। इसमें टीचिंग, नॉन टीचिंग एंप्लाइज जो पीरियड या लेक्चरर बेस पर कार्य कर रहे हैं, उन्हें 7 साल या 9600 घंटे पूरे होने पर अनुबंध पर लाने का प्रावधान बनाया था।
इस अधिसूचना को तन्वी वैद्य तथा अन्यों ने ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने अधिसूचना के अमल पर रोक लगा दी थी। रोक से प्रभावित प्रार्थियों ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने पाया कि एक तो यह जनहित से जुड़ा मामला है।
दूसरा यह अधिसूचना हाईकोर्ट के आदेशानुसार जारी की गई है। इसे केवल हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती थी। हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि जब शपथपत्र के माध्यम से सरकार की ओर से यह तथ्य ट्रिब्यूनल के ध्यान में लाया था।
फिर भी ट्रिब्यूनल ने 16 नवंबर 2015 को पारित स्थगन आदेश को जारी रखा। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के समक्ष चल रहे मामले को रद्द कर दिया और अधिसूचना पर अक्षरश: अनुपालना करने के आदेश जारी किए हैं।