न सात फेरे, न ही मंडप, बारात की अगवानी करता पैदल चलता दूल्हा, वह भी बिना सेहरे के, हिमाचल के सिराज क्षेत्र के लोग सदियों से देवता ‘बड़ादेव विष्णु मतलोड़ा’ के सम्मान में यह त्याग करते आ रहे हैं।
यहां आज भी वरनी शादी (देव संस्कृति के अनुसार शादियों) का प्रचलन है। इस शादी में दूल्हा बिना पालकी के बारात की अगवानी करता है तो दुल्हन भी बारात संग पैदल चलती है।
देवभूमि हिमाचल में युगों से यह परंपरा आज भी जीवंत है, जिसे त्रेता युग से जोड़कर देखा जाता है।
परंपरा के पीछे कई तर्क
मंडी और कुल्लू जिले के सबसे दुर्गम क्षेत्र सिराज में बड़े भू-भाग 14 हारों के मालिक देवता भगवान विष्णु का स्वरूप ‘बड़ादेव विष्णु मतलोड़ा’ में आज भी सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन किया जा रहा है।
वैसे तो इस परंपरा के पीछे कई तर्क प्रचलित हैं। एक तर्क यह है कि चूंकि सेहरा देव शृंगार है, इसलिए शादी में दूल्हा आज भी देव के शृंगार तुल्य सेहरे को धारण नहीं करते हैं।
परंपरा के पीछे देव समाज का तर्क है कि लोकाचार और स्थानीय परंपराएं शास्त्रों से ऊपर मानी जाती हैं। इसी कारण युगों बाद भी यह परंपरा जीवंत है।
कुंडली में मिलान में दोष हो तो वरनी शादियां
ऐसी मान्यता है कि जब शास्त्रों के ज्ञाता कुंडली मिलान में दोष बताते हैं तो देव ही शादी तय करते हैं।
शादियों के इस सीजन में ऐसी कई शादियां सिराज क्षेत्र में ‘बड़ादेव विष्णु मतलोड़ा’ ने तय की हैं।
देव खुद कार्यक्रम में शिरकत कर नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देते हैं।
स्थानीय लोकाचार और परंपराएं शास्त्रों से ऊपर
जानकार बताते हैं कि देव के सम्मान में आज भी सराज के 14 हारों के लोग सादगी का निर्वहन करते हैं।
देव समाज शास्त्रों की तुलना में लोकाचार और स्थानीय परंपरा को ऊपर मानता है। इनके निर्वहन के महत्व का वेदों में भी उल्लेख है।