तेज सिंह ने 1987-1988 में थर्मल पंप ईजाद किया। यह पंप पानी को कम लागत में बिना बिजली या डीजल से पंपिंग करने के काबिल था। इसमें बायो फ्यूल मसलन पत्ते, कागज, घास, लकड़ी आदि इस्तेमाल हो सकती थी। हिम ऊर्जा के तत्वावधान में यह पंप तैयार हुआ। वायुमंडल दबाव से पंप चलता था। 2002 में इस शोध के लिए नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन अवार्ड से नवाजा गया।
सस्ती बिजली पैदा करने की तकनीक
साल 1990 में चीड़ की पत्तियों से बिजली पैदा करने का दावा किया। ऊर्जा विभाग से संपर्क हुआ। इसमें अपने शोध में एक किलोग्राम चीड़ की पत्तियों से एक यूनिट बिजली पैदा करने की तकनीक की सार्थकता बताई। तकनीकी पहलुओं का हवाला देते हुए ऊर्जा विभाग ने उनके इस आविष्कार से मुंह मोड़ लिया। आविष्कार का पेटेंट किसी मान्यता प्राप्त एजेंसी से करवाने की बात कही।
मलोरी पौधे पर भी शोध चर्चा में रहा। उनका दावा था कि हिमाचल में आधुनिक कृषि में मलोरी पौधा मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस पौधे को बारह माह में बंजर जमीन में उगाया जा सकता है। इस पौधे से मुर्गों की फीड निकाली जा सकती है।
वर्ष 2012 में उन्होंने अपने अंतिम आविष्कार तारपीन से पेट्रोल बनाकर सबको हतप्रभ कर दिया। एनआईटी में इसका सफल ट्रायल होने के बावजूद न तो अनुसंधान को स्थापित करने के दावे जमीनी हकीकत पर खरे उतरे। न ही रिसर्च सेंटर खुल सका। बाकायदा, इसका सफल ट्रायल भी हुआ था।