हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ ने कहा है वीरवार को गैर अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ की मुख्यमंत्री के साथ हुई जेसीसी की बैठक बेनतीजा साबित हुई है। 4-9-14 मामले को कैबिनेट में ले जाने का जो निर्णय हुआ है, उसका कोई औचित्य नहीं लगता है। राजकीय अध्यापक संघ ने महासंघ के नेताओं पर आरोप लगाया कि वे तथ्यों को सही तरीके से मुख्यमंत्री के समक्ष नहीं रख पाए।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र चौहान, मुख्य संरक्षक अजीत चौहान, संरक्षक अरुण गुलेरिया, संजय कपूर, मनोहर लाल शर्मा, रविंद्र राठौर, महासचिव नरेश महाजन, वित्त सचिव मुकेश शर्मा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष सरोज मेहता सहित सभी जिला प्रधानों, कार्यकारिणी के सदस्यों ने कहा है कि 4-9-14 का मामला सिर्फ सात जुलाई 2014 की नोटिफिकेशन जो वित्त विभाग के द्वारा जारी की गई है, केवल उसे निरस्त करने की बात सभी कर्मचारी लंबे समय से कर रहे हैं।
4-9-14 की जो 2009 की अधिसूचना है वही अधिसूचना जारी रहनी है। ऐसे में इस मुद्दे को कैबिनेट में ले जाने का कोई बहुत बड़ा तर्क नजर नहीं आता है। इसी दिशा में हिमाचल राज्य अध्यापक संघ ने एक याचिका भी ट्रिब्यूनल में दायर की है। संघ के पदाधिकारियों ने कहा 2 प्रतिशत डीए की घोषणा जीसीसी की बैठक में की गई है, संघ को लगता है कि ये रूटीन मैटर है उसे जीसीसी का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। 2 प्रतिशत की किस्त सेंटर ने नए पे स्केल पर दी है।
हाल ही में दिसंबर महीने में पंजाब में डीए कि किस्त जारी की है वह पुरानी स्केल पर 7 प्रतिशत की दर से जारी की है। इसी आधार पर हिमाचल में भी पुराने पे स्केल के आधार पर 7 प्रतिशत की डीए की किस्त जारी होनी चाहिए थी। संघ ने आरोप लगाया कि महासंघ के शीर्ष नेता आईआर के मुद्दे को भी बैठक में नहीं भुना पाए। कांटेक्ट भर्तियों के पक्ष में कोई निर्णय नहीं करवा पाए।
महासंघ 2.75 लाख कर्मचारियों के हितों की बात करता है जो कि तर्क हीन है। इसमें महासंघ ने शिक्षकों को भी अपने साथ शामिल कर दिया जबकि शिक्षक इस जीसीसी का हिस्सा नहीं हैं और न ही उनकी कोई मांग को इस में रखा गया। संघ ने मुख्यमंत्री से शिक्षकों के लिए अलग जेसीसी करवाने की मांग की है।