महेंद्र सिंह ने कृषि विशेषज्ञों से आग्रह है कि वे किसानों तक पहुंच बनाएं और सरकारों को पहाड़ी किसानों के उत्थान के लिए प्रभावी नीतियों को लागू करने के लिए मार्गदर्शन करें। विशेषज्ञों को व्यावहारिक समाधान के साथ सामने आना चाहिए।
सम्मेलन में हिमाचल के पूर्व मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में गंभीर समस्याएं आ रही हैं। कृषि संकट के पीछे के मूल कारणों को जानना होगा।
उन्होंने कहा कि कुशल सेब मार्केटिंग के लिए शोध की आवश्यकता है। उन्होंने कुछ केंद्रीय योजनाओं पर फिर से विचार करने का भी सुझाव दिया। खाद्य नीति विश्लेषक और लेखक देवेंद्र शर्मा, एपीजी यूनिवर्सिटी शिमला के वाइस
चांसलर प्रोफेसर तेज प्रताप, नगालैंड के पूर्व मुख्य सचिव अलेमतेश्शी जामिर और अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव रमेश नेगी व शूलिनी विवि के कुलपति प्रो. अतुल खोसला ने भी अपने विचार रखे।
इंटिग्रेटेड माउंटेन इनीशिएटिव (आईएमआई) के अध्यक्ष सुशील रमोला ने कहा कि अगली पीढ़ी के किसान कृषि को फिर से परिभाषित करेंगे। युवा एवं शिक्षित किसान कृषि-उद्यमी हैं जो तकनीक पसंद हैं और बेहतर दक्षता के साथ बेहतर उपज के लिए वैज्ञानिक तकनीक से की जाने वाली कृषि को पहाड़ों में लेकर आएंगे।
आईसीआईएमओडी नेपाल के उपमहानिदेशक एकलव्य शर्मा ने कहा कि हिंदू-कुश हिमालय वैश्विक संपत्ति है जिसमें कुल 36 वैश्विक जैव विविधता बिंदू हैं। हिमालयी जैव विविधता को बनाए रखने के लिए अनुकूलता के प्रति संवेदनशीलता के परिप्रेक्ष्य से आगे बढ़ने की जरूरत है।
भारतीय हिमालय जलवायु अनुकूलन कार्यक्रम के प्रोजेक्ट लीडर व स्विस डेवलपमेंट कारपोरेशन स्विट्जरलैंड के मुस्तफा खान ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में फसलों की विविधता सबसे बड़ी ताकत है।