मुझे आज भी याद है जब मेरे पापा के पास मेरी फीस के पैसे तक नहीं होते थे। हमारे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पापा को मेरी किताबें खरीदने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते थे।
मेरा बचपन बहुत गरीबी में बीता है। इस सब के बावजूद मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में कोई अड़चन नहीं आने दी। यह कहना है चंबा जिले के हलेला गांव की रेखा देवी का। कहती हैं कि शायद वह मेरी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था।
मैं ऐसे माहौल में पली-बढ़ी जहां बेटियों को बोझ समझा जाता था। गांव वाले कहते थे कि बेटियां तो पराया धन हैं, दूसरे घर ही जाएंगी।
इन्हें पढ़ा-लिखाकर हमारा क्या फायदा, लेकिन मेरे पिता देशराज और माता रेनकु देवी ने इन सब बातों को नजरअंदाज किया। वे मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे।