कुछ महीने पहले पहली बार महेंद्र सिंह ने फैसला लिया कि आगे से इन पाइपों की ढुलाई किसी दूसरे मंत्री के अधीन चल रहे निगम के बजाय क्यों न उनके अपने ही बागवानी विभाग से संबद्ध हिम एग्रो कॉरपोरेशन से करवाई जाए। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम से यह ढुलाई वापस ले ली गई और हिम एग्रो को दी गई।
ढुलाई कमीशन भी दो प्रतिशत से घटाकर डेढ़ फीसदी की गई, जिससे आईपीएच विभाग की 50 लाख से एक करोड़ तक सालाना बचत हो सके। इस पर किशन कपूर के निगम में हायतौबा मच गई। मामला मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्य सचिव के कार्यालय पहुंचा। मुख्य सचिव ने उच्च अधिकारियों की बैठक ली। चर्चा हुई कि पहले भी विवादित रह चुके हिम एग्रो की माली हालत पतली है।
पेयजल आपूर्ति पर सरकार को पहले ही परेशानी हो चुकी है। अब कोई जोखिम उठाना ठीक नहीं। नागरिक आपूर्ति निगम से ही पूर्ववत दो फीसदी कमीशन पर खरीद करवाना सही रहेगा। इसके बाद आईपीएच मंत्री अड़ गए कि दो फीसदी नहीं, केवल डेढ़ फीसदी कमीशन दिया जाएगा।
मंत्री किशन कपूर के नियंत्रण के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम को यह शर्त माननी पड़ी। अब इसे साल का 50 लाख रुपये से एक करोड़ तक का घाटा होगा। आईपीएच विभाग हर साल करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपये की पाइपों की खरीद करता है।
हमें पाइपों की ढुलाई का कमीशन घटाना पड़ा है। इसे दो से घटाकर डेढ़ फीसदी करना पड़ा है। यह सही है कि हमें इसका घाटा होगा, मगर हर साल पाइपों की खरीद के बढ़ जाने से कहीं न कहीं इसकी क्षतिपूर्ति भी हो जाएगी। - एसएस गुलेरिया, प्रबंध निदेशक, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम