भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान ने गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की अमर कृति ‘गीतांजलि’ का कन्नड़, तेलुगू और मलयालम समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद शुरू किया है। यह पहल संस्थान के टैगोर अध्ययन केंद्र के माध्यम से की जा रही है। इस पहल से नई पीढ़ी भी गुरुदेव के प्रवचनों से रूबरू होगी। इसका उद्देश्य टैगोर के साहित्य और विचारों को देश के व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना है।
यह परियोजना गुरुदेव के मानवतावादी और सार्वभौमिक विचारों को समकालीन समाज तक ले जाने का प्रयास है। संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि गीतांजलि केवल एक काव्य संग्रह नहीं है। यह भारतीय चिंतन और मानवीय संवेदनाओं का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि टैगोर के साहित्य को नई पीढ़ी और विभिन्न भाषायी समुदायों तक पहुंचाने के लिए अनुवाद सबसे प्रभावी माध्यम है।
इसी सोच के तहत गीतांजलि का कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद कार्य शुरू किया गया है। टैगोर अध्ययन केंद्र गुरुदेव के साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, दर्शन और सभ्यता संबंधी चिंतन के अध्ययन और प्रसार के लिए कार्य करता है। इस केंद्र की स्थापना टैगोर की 150वीं जयंती पर हुई थी। यह केंद्र शोध, व्याख्यान, अध्ययन कार्यक्रम और प्रकाशन गतिविधियों के साथ-साथ अनुवाद परियोजनाओं को भी बढ़ावा दे रहा है।
गौरतलब है कि गीतांजलि का गुरुदेव टैगोर ने स्वयं अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसने गीतांजलि को विश्वभर में पहचान दिलाई। इसके बाद ही यह कृति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई और साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हुई। गीतांजलि कविताओं का एक संग्रह है। यह गहन आध्यात्मिकता, भक्ति और मानवीय भावनाओं को दर्शाती है। यह कृति ईश्वर के प्रति प्रेम, प्रकृति से जुड़ाव और मनुष्य के आंतरिक संघर्षों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। गीतांजलि अपनी दार्शनिक गहराई और गीतात्मक शैली के लिए विख्यात है।