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धारा-118 में गड़बड़झाले की विजिलेंस जांच में नया पेच, मित्रा ने किया इनकार

Sun, 09 Dec 2018 11:29 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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धारा-118 में गड़बड़झाले की विजिलेंस जांच में एक नया पेच खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने पूर्व मुख्य सचिव पी मित्रा के खिलाफ जांच शुरू करने की मंजूरी दी तो अब उन्होंने पॉलीग्राफ टेस्ट लेने की अपनी कंसेंट देने से ही इनकार कर दिया है। पी मित्रा ने पॉलीग्राफ टेस्ट करवाने के खिलाफ एक दलील दी है कि वह स्वस्थ नहीं हैं और इस टेस्ट के लिए फिट नहीं हैं।

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अदालत में मित्रा की इस अरजी पर विजिलेंस ब्यूरो को अपना जवाब अदालत में दायर करना होगा। इसके लिए अदालत से विजिलेंस को नोटिस गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई के दिन 19 दिसंबर है। यह मामला कसौली में एक रिजॉर्ट के लिए जमीन खरीद की मंजूरी से संबंधित है। विजिलेंस ब्यूरो ने भू-सुधार एवं मुजारा अधिनियम की धारा-118 के तहत कसौली में दी गई भूमि खरीद की एक मंजूरी पर जांच बैठाई है।

इस मंजूरी में अवैध वसूली के आरोप हैं। इसका आधार एक फोन रिकॉर्डिंग है। इस रिकॉर्डिंग में तत्कालीन प्रधान सचिव राजस्व पी मित्रा और एक व्यवसायी विनोद मित्तल की आवाज बताई जा रही है। विजिलेंस पूछताछ में अवैध वसूली के आरोपों को पी मित्रा खारिज कर चुके हैं, मगर विजिलेंस ब्यूरो इन्हीं आरोपों को स्थापित करना चाह रहा है, इसीलिए उनके पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए कोर्ट से अनुमति मांगी गई है। सूत्रों के मुताबिक अब इसी अनुमति के खिलाफ पी मित्रा ने अपनी अरजी दी है, जिसमें स्वास्थ्य ठीक न होने को आधार बनाया गया है।
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क्या है पॉलीग्राफ टेस्ट 
पॉलीग्राफ टेस्ट को लाई डिटेक्टर टेस्ट भी कहते हैं। यह टेस्ट एक ऐसी मशीन से किया जाता है, जिसका प्रयोग झूठ पकड़ने के लिए किया जाता है। खासकर इसका प्रयोग तब किया जाता है जब किसी अपराध का पता लगाना हो। भारत के अंदर इस टेस्ट से पहले कोर्ट से अनुमति लेना आवश्यक है। इससे यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है या सच बोल रहा है। इससे कई चीजों जैसे हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर आदि को परखा जाता है।

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जांच अफसरों को उचित प्रशिक्षण देने के आदेश

हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को आपराधिक मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों व कर्मियों को उपयुक्त प्रशिक्षण देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट का कहना है कि प्रशिक्षण मिलने से किसी भी आपराधिक मामले की सच्चाई पूरी तरह से कोर्ट के सामने आएगी और असली गुनहगार को सजा मिल सकेगी। इससे सजा की दर में भी बढ़ोतरी होगी और न्याय व्यवस्था का असली मकसद भी पूरा होगा।

हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी व न्यायाधीश  विवेक सिंह ठाकुर की खंडपीठ ने उपरोक्त आदेश पारित किए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में अनौपचारिक जांच के चलते बेगुनाहों को सजा हो जाती है और असली गुनहगार सरेआम छूट जाते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर प्रदेश सरकार के पास इन अधिकारियों व कर्मियों को ट्रेनिंग देने के लिए उपयुक्त स्थान का अभाव है तो पुलिस विभाग इस बाबत हिमाचल प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी से सहयोग की मांग सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि पिछले कुछ वर्षों से आपराधिक मामले की जांच  को लेकर बहुत सारी खामियां सामने आ रही हैं। जिसके चलते विभाग को उपयुक्त कदम उठाने चाहिए ताकि कोर्ट के समक्ष सच्चाई आ सके और जो सच नही है, उसे कोर्ट के समक्ष पेश न किया जाए। कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े आपराधिक मामले में 12 वर्षों की सजा काट रहे व्यक्ति को रिहा करते हुए उपरोक्त निर्देश जारी किए।
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