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हर साल कई मौतें टेस्ट की सुविधा फिर भी नहीं

Sat, 25 Jul 2015 12:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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जिला शिमला में स्क्रब टायफस के टेस्ट की सुविधा नहीं है। आईजीएमसी को छोड़ दिया जाए तो कहीं भी इस बीमारी का टेस्ट लोग नहीं करवा सकते। सरकारें हर साल ब्लॉक स्तर पर स्क्रब टायफस की टेस्ट सुविधा मुहैया करवाने के दावे करती है लेकिन होता कुछ नहीं। शुक्रवार को आईजीएमसी में नौ लोगों में स्क्रब टायफस के लक्षण पाए गए हैं। इसकी पुष्टि वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक डा. रमेश ने की है।
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ग्रामीण हल्कों में सबसे ज्यादा मरीज इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। जागरूकता के अभाव में लोग इसे सामान्य बुखार समझने की भूल कर बैठते हैं। जब तक बुखार की असल वजह सामने आती है तब तक बीमारी शरीर को पूरी तरह जकड़ लेती है। स्वास्थ्य महकमे के पास स्क्रब टायफस से मरने वालों का केवल वहीं आंकड़ा है जो आईजीएमसी के रिकार्ड में है।

कुछ मरीज जो घर पर या फिर अन्य अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं उनका कहीं कोई रिकार्ड नहीं है। प्रदेश में केवल आईजीएमसी अस्पताल में ही स्क्रब टायफस टेस्ट की सुविधा है। ब्लॉक स्तर पर अगर टेस्ट मशीनें हो तो इस बीमारी पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है।
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सरकार हर साल प्रत्येक अस्पताल में टेस्ट सुविधा देने की बात करती है लेकिन बाद में भूल जाती है। आईजीएमसी में दो मरीजों की मौतें हो चुकी है। स्क्रब टायफस के मामले जुलाई से लेकर अक्तूबर तक सबसे ज्यादा आते हैं।

374 स्वास्थ्य संस्थान टेस्ट कहीं भी नहीं- जिला में 10 सिविल अस्पताल हैं। 9 सीएचसी, 104 पीएचसी , 251 हेल्थ सब सेंटर हैं। इनमें से कोई भी स्वास्थ्य संस्थान मरीज को पक्के तौर पर नहीं बता सकता कि वह स्क्रब टायफस से पीड़ित हैं या नहीं। इसके लिए मरीज को प्रमाणिकता के लिए आईजीएमसी अस्पताल आना पड़ता है। ऐसे में दूरदराज इलाकों में रहने वाले प्रत्येक मरीज का आईजीएमसी तक पहुंचना संभव नहीं।

घास में रहने वाली कीट देते हैं यह रोग- बरसातों में इस बीमारी का प्रकोप रहता है और अक्तूबर तक इसका प्रभाव माना जाता है। धूप खिलने पर इसका ज्यादा खतरा बढ़ जाता है। कीट, घास और झाड़ियों की जड़ों से उठकर खुद को सुखाने के लिए घास के ऊपर बैठ जाते हैं और वहां से गुजरने वाले व्यक्तियों के संपर्क में आकर उन्हें काट लेते हैं जिससे यह बीमारी पनपती है।

चिकित्सकों के परामर्श पर लें ये दवा- स्क्रब टायफस के लिए कोई स्पेशल वैक्सीन भी नहीं बनी है। मरीज को डोक्सीसाइक्लीन और एजिथ्रोमाइसीन की गोलियां दी जाती हैं। एजिथ्रोमाइसिन की गोलियां गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को सुबह शाम एक-एक गोली देनी होती है। विशेषज्ञ चिकित्सक बताते हैं कि इस बीमारी का इलाज समय रहते करना आसान है। देर होने पर मरीज की जान पर बन आती है। स्क्रब टायफस मरीज के महत्वपूर्ण अंगों पर हमला करता है और लीवर किडनी तथा आंतों को नुकसान पहुंचाता है। यही वजह है कि मरीज के देरी से अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर उसकी जान बचाने में कामयाब नहीं हो पा रहे।

बचाव के उपाय
घर के आसपास सफाई रखें। आंगन से घास और छोटी झाड़ियों को काट दें।
खेतों और जंगल के रास्ते से गुजरते समय जुते तथा पूरी बाजू के कपड़े पहने।
तेज बुखार होने पर अपनी मर्जी से दवा न लें।
अस्पताल में जांच के बाद तुरंत उपचार करवाएं।

ये हो सकते हैं अधिक प्रभावित- पशुपालक और किसानों को इस रोग को लेकर अधिक सावधान रहने की जरूरत है। बीमारी का कारण पिस्सु होते हैं। बरसात के दौरान छोटी हरी घास और झाड़ियों पर यह पिस्सू फलते फूलते हैं। इस दौरान उसके लारवा घास के पत्तों पर चिपके रहते हैं। जोकि घास काटते समय आसानी से किसानों के शरीर से चिपक जाते हैं और बीमारी को जन्म देते हैं।

स्थिति पर रख रहे हैं नजर- मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. रणवीर राणा ने कहा कि सभी बीएमओ को निर्देश दिए हैं कि वह बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक करें। जागरूकता के लिए पर्चे भी बांटे जा रहे हैं। इस बीमारी से संबंधित दवाओं का स्टॉक पर्याप्त है।
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