वर्ष 2001 में प्रधानमंत्री होते हुए वाजपेयी से उन्हें मिलने का मौका मिला था। सात मिनट की इस मुलाकात में वह उनके सामने एक शब्द भी नहीं बोल पाए थे। लेकिन अटल ने उन्हें चंद शब्दों में ही जहन में उठे पांच सवालों का जवाब दे दिया। डॉ. ठाकुर ने कहा कि यहीं से उन्हें उनके पूरे जीवन का दर्शन मिल गया।
बोले कि ‘मैं, उन पर शोध कर रहा हूं तो उन्होंने कहा कि मंगलम अस्तु।’ इसके अलावा उन्हें मंडी और सुंदरनगर में दो बार मंच से संबोधित करने का मौका भी मिला। वर्ष 2006 से लेकर वह लगातार 25 दिसंबर को वाजपेयी के जन्मदिन पर एक पुस्तक प्रकाशित करते आ रहे हैं। अब तक वह वाजपेयी के जीवन और काव्य, राजनेता के रूप में दिए भाषणों पर कई किताबें प्रकाशित कर चुके हैं।
डॉ. ठाकुर की पुस्तक काव्य यात्रा के यायावर में उन्होंने अटल बिहारी की शिमला समझौता पर लिखी पंक्तियों का भी उल्लेख किया है। इसमें वाजपेयी ने लिखा है, मैदान में जीत गए, पर मेज पर हारे, तीस हजार वर्ग मील पाकिस्तान के पास हमारी है, हमें मिलनी चाहिए, इसकी एवज में हमें पाकिस्तान की एक गज जमीन नहीं चाहिए की व्याख्या की है।
वर्ष 1999 में शुरू की थी एमफिल
सह आचार्य डॉ. इंद्र सिंह ठाकुर को कुरुक्षेत्र विवि में एमफिल करने के लिए वाजपेयी की कविताओं में संवेदना और शिल्प का स्वरूप विषय मिला था। यहीं से उनकी इस महान व्यक्तित्व को उनकी रचनाओं के माध्यम से जानने का सफर शुरू हुआ। वाजपेयी उस समय प्रधानमंत्री बन गए थे। डॉ. ठाकुर ने कहा कि उस समय उन्हें घबराहट थी कि पता नहीं कर पाऊंगा कि नहीं।
उनकी पहली रचना.. हार नहीं मानूंगा, रार नहीं मानूंगा काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं...ने उन्हें आगे बढ़ने का मूलमंत्र दिया। 2000 में एमफिल का शोध पूरा किया। डॉ. इंद्र सिंह ने कहा कि वे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी पर शोध करने वाले पहले एमफिल थे। इसके बाद एचपीयू से कवि राजनेता वाजपेयी का अटल व्यक्तित्व विषय पर पीएचडी शुरू की जिसे उन्होंने 2005 में पूरा किया।