कांगड़ा से जयराम कैबिनेट में चार मंत्री पद मिले थे लेकिन सभी अपने विधानसभा क्षेत्र के मोहजाल के चलते जिला के नेतृत्व की बागडोर संभालने से चूक गए। बिक्रम ठाकुर और सरवीण चौधरी अपने विस क्षेत्रों से बाहर नहीं निकल पाए। कपूर दिल्ली पहुंच गए।
सभी बड़े नेता राजनीतिक रूप से अकेले पड़ चुके हैं। इस पूरे सियासी चक्रव्यूह में कांगड़ा के हाथ से नेतृत्व की बागडोर खिसककर दूसरे जिलों में जाने के चलते सूबे का सबसे बड़ा जिला राजनीतिक शून्यता की ओर बढ़ता जा रहा है। हालांकि, इन्वेस्टर मीट के बहाने जयराम कांगड़ा को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
शांता, सत महाजन, संत राम ने संभाली थी बागडोर
दो बार मुख्यमंत्री रहे शांता कुमार ने जिला कांगड़ा के बाहर अपने उत्तराधिकारी के तौर पर धूमल, नड्डा और जयराम सरीखे कई नेताओं को तैयार किया लेकिन अपने ही जिले में वह खुद के बाद नेतृत्व पैदा करने में चूक गए। उधर, कांग्रेस की ओर से सत महाजन और संतराम ने जरूर कांगड़ा की बागडोर अपने हाथ में ली थी लेकिन बाद में कोई बड़ा नेता खुद को साबित नहीं कर पाया।
कांगड़ा के लिए स्थिति अच्छी नहीं : शर्मा
परमार, रामलाल, वीरभद्र, शांता और धूमल सरकार में अहम पदों पर रहे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एवं राजनीतिक विश्लेषक केसी शर्मा कहते हैं कि सियासी शून्यता की स्थिति कांगड़ा जिले के लिए वांछनीय नहीं है। इस शून्य को भरने के लिए संबंधित दलों को अपने भीतर आंतरिक विचार मंथन करने के उपरांत किसी नए युवा नेतृत्व का निर्माण करना आवश्यक है