पपीता अब जल्दी खराब नहीं होगा। हिमाचल प्रदेश सहित देशभर में इसकी पैदावार बढ़ेगी। इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने शोध कर एक फार्मूला तैयार किया है। गोंद और पपीते के पत्तों के अर्क से बनी कोटिंग ने फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ा दी।
शोध में ग्वार गम, जैथन गम और गोंद अरबी के साथ पपीते के पत्तों का रस मिलाकर कोटिंग की गई, जिससे पपीते के फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ गई। यह प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) शिमला ने किया है। इसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के तिरहुत कृषि महाविद्यालय के बागवानी विभाग ढोली, स्नातकोत्तर कृषि महाविद्यालय पूसा के बागवानी विभाग, वनस्पति विज्ञान और पादप शरीर क्रिया विज्ञान विभाग और पादप रोगविज्ञान विभाग का विशेष सहयोग रहा है।
इस शोध में एमके लाल, आरके तिवारी, के. रविंदर, के. प्रसाद, एच. अक्षता, जे. प्रधान, एसके सिंह, के. उदित, एन. सरोज, सी. मुखिम जैसे अधिकारियों और शोधार्थियों ने भाग लिया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शोधकर्ताओं की ओर से हाल ही में किए इस शोध में हाइड्रोकोलॉइड यानी गोंद और पपीते के पत्तों के अर्क से बनी एक मिश्रित खाद्य कोटिंग लगाने से शोधकर्ता फलों की गुणवत्ता और दीर्घायु में उल्लेखनीय सुधार करने में सक्षम हुए। पपीते पर इसे लगाने से कोटिंग नमी बनाए रखने, सड़न को रोकने और फलों की समग्र गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद मिली।
अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि यह पर्यावरण सुरक्षित कोटिंग पपीते के फलों को संरक्षित करने का एक प्रभावी और टिकाऊ तरीका है। अध्ययन में पाया गया कि कोटिंग से उपचारित पपीते के फलों में फिनोल और एस्कॉर्बिक एसिड जैसे जैव रासायनिक यौगिकों का स्तर अधिक था। शारीरिक और एंजाइमेटिक गतिविधि का स्तर कम था, जो क्षय में योगदान देता है।