गिरि और जलाल नदी के संगम स्थल पर रविवार दोपहर 2.00 बजे मां रेणुका और परशुराम के भव्य मिलन के साथ अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले का भव्य आगाज हुआ। पहाड़ी से उतरकर भगवान परशुराम रेणुका स्थल में आए। इस देव मिलन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़े।
रेणुका मेले के आगाज पर शोभायात्रा भी निकाली गई जिसमें मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने देव पालकी को कंधा देकर पारंपरिक रीति रिवाजों का निर्वहन किया। शोभायात्रा गिरि नदी के तट से शुरू होकर ददाहू बाजार, गिरिपुल, बेढ़ाण गांव, देवशिला, मेला मैदान व रेणु मंच से होते हुए शाम को प्राचीन देवालय परिसर पहुंचीं।
शोभायात्रा में परशुराम के प्रसिद्ध व प्राचीन मंदिर से लाई गई चांदी से सुसज्जित पालकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रही। इसके अतिरिक्त भगवान परशुराम मंदिर कटाह, माशु व मंडलाह के मंदिरों से लाई पालकियों को भी शोभायात्रा में शामिल किया गया।
परशुराम के सामने नहीं आते फागड़ देवता
रेणुका मेले में भगवान परशुराम के अलावा अन्य देवता संगम स्थल पर स्नान के बाद शोभायात्रा में एकसाथ शिरकत करते हैं। लेकिन धारटीधार के फागड़ देवता रेणुका मेले में शोभायात्रा के दो घंटे बाद पहुंचते हैं। मान्यता के अनुसार फागड़ देवता और भगवान परशुराम एक साथ नहीं चल सकते।
क्योंकि फागड़ देवता कीमूर्तियों को गांव के लोग कहीं से चुराकर लाए थे। तब से चुराए हुए फागड़ देवता पर परशुराम रूष्ठ हैं। इसलिए फागड़ देवता परशुराम के सामने नहीं आते। स्नान की परंपरा कटवाड़ी बागड़ पंचायत के फागड़ गांव के श्रद्धालु निभाते हैं।