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ढाई रुपये फीस न भर पाने पर खली को सुनने पड़े थे ताने

Tue, 31 Jan 2017 02:05 PM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
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भारत के पहले डब्ल्यूडब्ल्यूई रेसलर खली को बचपन में गरीबी के कारण आठ साल की उम्र में ही स्कूल छोड़ दिहाड़ी मजदूर बनना पड़ा था। यह खुलासा खली ने अपनी आत्मकथा ‘द मैन हू बिकम खली’ में किया है। खली ने इस किताब में कई प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया है। 
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उन्होंने बताया कि उनके परिजन गरीबी के कारण ढाई रुपये की स्कूल फीस का भार उठाने में अक्षम थे। इस कारण उन्हें दूसरी क्लास में ही स्कूल छोड़ना पड़ गया था तथा दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ी थी। वह लिखते हैं, 1979 की गर्मियों के दिन थे। सभी मानसून का इंतजार कर रहे थे। फसल सूखे का शिकार हो गई थी।

पहली बार गांव में पेड़ लगाने की नौकरी मिली

घर में फीस देने के लिए पैसे नहीं थे। अभी मुझे दूसरी कक्षा में आए करीब एक ही महीना हुआ था। प्रिंसिपल हर रोज फीस के लिए मुझे ताने मारते थे। एक दिन शिक्षक ने पूरी क्लास के सामने मुझे गालियां दीं। सभी मुझ पर हंस रहे थे और मेरा मजाक बना रहे थे।

मैंने तभी कभी भी स्कूल नहीं जाने का फैसला कर लिया था। मेरी पढ़ाई उसी दिन हमेशा के लिए बंद हो गई थी। मैं अपने घर और परिवार की मदद के लिए काम खोजने लगा था। खली आगे लिखते हैं, एक दिन मैं अपने पिता के साथ था। तभी एक आदमी ने गांव में पेड़ लगाने की नौकरी की जानकारी दी। 
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पहली बार पांच रुपये मिले तो फूले न समाए खली

उसने बताया कि इस काम में हर रोज पांच रुपये मिलेंगे। यह सुनते ही मेरी आंखें आश्चर्य में फैल गईं थीं। मेरे लिए पांच रुपया बहुत बड़ी रकम था। मैं सोचने लगा था कि अभी हमारे पास फीस के ढाई रुपये भी नहीं थे। पांच रुपये इसकी तुलना में जैकपॉट था। मैं काम करने के लिए तैयार हो गया। 

जब पहले दिन के काम के बाद मुझे पांच रुपये का नोट मिला, मैं अपनी पहली कमाई पाकर सातवें आसमान पर था। उन्होंने बताया कि उनकी पहली नौकरी शिमला में मिली थी। वहां वह एक कारोबारी के अंगरक्षक थे और इसके लिए उन्हें प्रति माह 1500 रुपये मिलते थे।
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