संस्था के सदस्य डॉ. पीडी लाल ने पत्र में अंदेशा जताया कि बिजली परियोजनाओं के निर्माण से घाटी का ईको सिस्टम गड़बड़ाएगा। घाटी के बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ जनजातीय समाज की दुर्लभ संस्कृति को भी क्षति पहुंचेगी।
संस्था के संयोजक रिगजिन हायरपा ने कहा कि लोगों के विरोध के चलते 300 मेगावाट की जिस्पा बांध परियोजना ठंडे बस्ते में चले गई है। यहां भी प्रोजेक्टों के विरोध और संघर्ष की लड़ाई जारी रहेगी।
वर्ष 2009 में हिमाचल के लाहौल-स्पीति क्षेत्र को जैव संपदा सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया है। यह क्षेत्र यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में भी शामिल है।
सेव संस्था ने केंद्र सरकार से लाहौल और पांगी के चिनाब बेसिन को ईको सेंसिटिव जोन घोषित कर इन परियोजनाओं को निरस्त करने की मांग उठाई है।
बेहद नाजुक इकोलॉजिकल सिस्टम वाले चिनाब बेसिन में एक साथ इतने मेगा प्रोजेक्ट बनने से निश्चित तौर पर ग्लेशियरों के वजूद को खतरा होगा। परियोजनाओं के निर्माण से प्रदूषण का स्तर बढ़ने से ग्लेशियर ही नहीं, घाटी की जैव विविधता पर भी प्रतिकूल असर होगा। इससे सैकड़ों साल पुराने ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज होगी। -डॉ. जेसी कुनियाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जीबी पंत राष्ट्रीय पर्यावरण एवं शोध संस्थान