पार्टी में केंद्र बिंदु बने रहे वीरभद्र सिंह की पीठ के पीछे भले ही विरोधी नेता कई बार सक्रिय रहे हों, लेकिन सामने मुखर होकर कभी आवाज बुलंद नहीं कर पाए।
पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह हिमाचल में कांग्रेस की धुरी रहे हैं। उनके निधन से पार्टी को भारी नुकसान हुआ है। वीरभद्र सिंह का रुतबा इतना ऊंचा रहा है कि पार्टी के बड़े नेता भी मुखर होकर उनका विरोध नहीं कर पाए। अब वीरभद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी में एकजुटता रखना आसान नहीं होगा।
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प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट यही है कि अब कौन सा नेता पार्टी की धुरी बनकर उभरेगा, जो पार्टी को एकजुट रख सके। वर्तमान में कांग्रेस में नेताओं की दूसरी पंक्ति तैयार नहीं हो पाई है। इस कारण कांग्रेस को कई चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है।
पार्टी में केंद्र बिंदु बने रहे वीरभद्र सिंह की पीठ के पीछे भले ही विरोधी नेता कई बार सक्रिय रहे हों, लेकिन सामने मुखर होकर कभी आवाज बुलंद नहीं कर पाए। सवाल यह भी उठने लगा है कि वीरभद्र के बाद अब पार्टी का कौन नेता धुरी बनकर उभरेगा। जो पार्टी नेताओं को एकजुट भी रख सके और गुटबाजी पर विराम लगा सके।
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प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे पहले उप चुनाव की चुनौती से जूझना होगा। मंडी संसदीय उप चुनाव के साथ फतेहपुर, जुब्बल कोटखाई और अर्की विधानसभा उपचुनाव होने हैं। ये उपचुनाव कांग्रेस के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं हैं। इसके बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कमी जरूर कांग्रेस को खलती रहेगी।