उद्यमी ने दलील दी कि उसकी औद्योगिक इकाई में सेफ़ा समूह की दवाइयां भी बनाई जाती हैं जो पूर्णतया कर मुक्त हैं। जब उद्योगपति से दवाइयों को कर मुक्त घोषित करने की अधिसूचना देने को कहा तो उद्योगपति पलट गया और फंस गया। जांच टीम ने उद्योगपति के सी फॉर्म की जांच की तो कच्चा चिट्ठा खुल गया।
सी फार्म से ऐसे हुई तस्वीर स्पष्ट
उद्योग के उत्पादन की आधी दवाइयां सी फॉर्म से बाहरी राज्यों में बेची जाती थीं। उद्योगपति ने अपने वास्तविक अंतरराज्यीय व्यापार में प्राप्त किए असली फॉर्मों पर दर्शाई गई रकम के अंकों में कुछ अंक जोड़कर उसे बढ़ा डाला। ताकि ये पेश कर सकते कि कर मुक्त दवाइयां भी फॉर्मों के जरिये बेची गई थीं। फोरेंसिक प्रयोगशाला जुन्गा (शिमला) में तस्वीर साफ हो गई।
तथ्य सामने रखे तो उद्योगपति ने मानी गलती
उप आबकारी एवं कराधान आयुक्त डॉ. सुनील कुमार ने टैक्स चोरी की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि जब तथ्यों को उद्योगपति के सामने रखा तो उसने तुरंत अपनी गलती स्वीकार कर टैक्स अदा करने की हामी भर दी।
पिछले पांच वर्षों में लगभग 50 करोड़ की दवाइयों पर टैक्स की चोरी हुई है। एक माह में पूरी राशि 3 करोड़ 85 लाख जमा करवाने का समय दिया है। उद्योगपति को 5 करोड़ तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है।