इन सेब पौधों को टेस्ट ट्यूब में टिशू डालकर तैयार किया जाता है। उसके बाद इसमें केमिकल डाले जाते हैं।बाद में ये फ्लास्क में डाले जाते हैं। इन्हें 40 से 42 दिन की प्रक्रिया के बाद तैयार किया जाता है।
दो चरणों में पौधा लैब में रहता है। इसके बाद ग्लास हाउस और फील्ड में दो चरण में पौधे को बागवानों को देने लायक बनाया जाता है। प्रचार यह किया जाता रहा है कि ये पौधे रोगरोधी होते हैं और इनमें फल अच्छे उगते हैं।
विश्वविद्यालय से नहीं ली सलाह
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के पूर्व कुलपति डॉ. विजय सिंह ठाकुर वर्तमान मेें इसी विश्वविद्यालय में निदेशक विस्तार हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक महज प्रयोगों के लिए ठीक है।
बागीचा लगाने के लिए सही नहीं है। टिशू कल्चर से बनाए गए पौधे कचालू, केले, फूलों आदि के लिए ठीक हैं। दुनिया में कहीं भी चले जाएं, ऐसे पौधे कहीं भी बागीचों में नहीं हैं।
किसी ने इस तकनीक पर जाने से पहले बागवानी विश्वविद्यालय को नहीं पूछा। वरना यह नौबत नहीं आती।