न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने लोकेश शर्मा और अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं को हिमाचल प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के माध्यम से 2 दिसंबर 2014 को अनुबंध के आधार पर पीजीटी नियुक्त किया गया था। 2 जून 2018 को उनकी सेवाओं को नियमित कर दिया गया। दूसरी ओर पीटीए नीति में 2006-08 में रखे गए शिक्षकों को सरकार ने जनवरी 2015 में अनुबंध पर लिया और एक अप्रैल 2018 में नियमित कर दिया। इस पर याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि वे सरकारी भर्ती प्रक्रिया से 2014 में आ गए थे, इसलिए वे जनवरी 2015 में अनुबंध पर आए पीटीए शिक्षकों से वरिष्ठ हैं। पीटीए शिक्षकों को 1 अप्रैल 2018 से नियमितीकरण का लाभ दिया गया, जबकि उन्हें देरी से दिया गया।
याचिकाकर्ताओं को 4 फरवरी 2023
से मिलेंगे वास्तविक वित्तीय लाभ याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत का रुख करने में की गई देरी को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उन्हें वास्तविक वित्तीय लाभ याचिका दायर करने की तिथि से 3 वर्ष पूर्व यानी 4 फरवरी 2023 से मिलेंगे। उससे पहले की अवधि के लाभ केवल काल्पनिक रूप से वेतन और पेंशन की गणना के लिए गिने जाएंगे। वरिष्ठता सूची के पुनरीक्षण के संबंध में अदालत ने तीसरे पक्ष के अधिकारों का ध्यान रखते हुए व्यवस्था दी कि इस देरी के कारण जो कनिष्ठ कर्मचारी पहले ही पदोन्नत हो चुके हैं, उन्हें उनके पदों से डिमोट नहीं किया जाएगा। हालांकि, जो कर्मचारी अब तक पदोन्नत नहीं हुए हैं, उन्हें संशोधित वरिष्ठता सूची में याचिकाकर्ताओं के नीचे रखा जाएगा।
दयोड-हनौगी टनल को लेकर हाईकोर्ट में पेश की रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि दयोड-हनोगी टनल को एकतरफा ट्रैफिक के लिए खोल दिया गया है, इससे मंडी और कुल्लू के बीच की दूरी 18 किलोमीटर कम हो गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि टनल के खुलने से मंडी से कुल्लू की दूरी 78 किलोमीटर से घटकर अब केवल 60 किलोमीटर रह गई है। फिलहाल ट्रैफिक को दाहिनी ओर की टनल से गुजारा जा रहा है, जिससे पुराने हाईवे के खतरनाक मोड़ों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों से निजात मिल गई है। दूसरी ओर की दूसरी टनल का काम भी जल्द पूरा कर इसे दोनों तरफ के ट्रैफिक के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान इस राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट की प्रगति की समीक्षा करते हुए सुरक्षा कार्यों को बिना रुकावट जारी रखने के कड़े निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान बताया गया कि मार्कण्डेय मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए तय किया गया मुआवजा अपर्याप्त है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर की ब्रेस्ट वॉल और रिटेनिंग वॉल का अलग से एस्टीमेट तैयार कर आवश्यक फंड जारी किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि यह राष्ट्रीय महत्व का प्रोजेक्ट है, इसमें बड़ी सार्वजनिक राशि लगी है, इसलिए स्लोप प्रोटेक्शन का काम किसी भी सूरत में रुकना नहीं चाहिए। जिला प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि यदि आवश्यक हो, तो ठेकेदार और एनएचएआई को निर्माण कार्य पूरा करने के लिए तुरंत पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई जाए।