इसमें कलम करके सेब के रॉयल सेब या इससे भी बड़ा नाशपाती का पेड़ तैयार हो जाता है। एक बडे़ पेड़ में 25 से 28 किलोग्राम के आठ से दस कार्टन तक उतारे जा सकते हैं। एक कार्टन या पेटी 1800 से 2000 रुपये तक भी आसानी से बिकती आई है।
पुराने वक्त में बागवान इसे पथरीली जमीन या फिर मेड़ पर भी उगाते आए हैं। ये नाशपाती शिमला, सिरमौर, कुल्लू, मंडी, कांगड़ा आदि जिलों के निचले से लेकर ऊपरी फल उत्पादक क्षेत्रों में उगाई जाती रही है, मगर बीच में सेब को उगाने का चलन ज्यूं-ज्यूं तेज होता गया तो बागवान इस नाशपाती के पेड़ को जड़ से ही उखाड़ने लगे। तब इस नाशपाती को रेट नहीं मिलते थे।
शिमला के सेब बहुल क्षेत्र डुमैहर गांव के बागवान राजपाल चौहान केवल नाशपाती उगाते हैं। चौहान के पास नाशपाती के करीब 3000 पौधे हैं। उन्होंने बताया कि तुंबा नाशपाती की एक लेट वैराइटी है। ये अक्तूबर और नवंबर महीने में उगती है।
इस पर हुई कई तरह की खोज बताती हैं कि यह शरीर में कैंसर नहीं पनपने देती है। बागवान इस पर अच्छे रेट ले सकते हैं। एक अन्य बागवान प्रशांत सेहटा बताते हैं कि तुंबा नाशपाती को अच्छे रेट मिल रहे हैं। उन्होंने इसी से मिलती-जुलती कांफ्रेंस नाशपाती के पौधे भी लगाए हैं और उम्मीद है कि इसे भी अच्छे दाम मिलेंगे।
तुंबा नाशपाती पर विश्वविद्यालय की ओर से फीडबैक लिया जाएगा। ये सही है कि इसे सूखे में भी तैयार करना आसान है। इसमें ज्यादा बीमारियां भी नहीं लगती हैं। बागवानों को इस नाशपाती अच्छे रेट मिल रहे हैं।- डा. पंकज गुप्ता, सह निदेशक, बागवानी अनुसंधान क्षेत्र मशोबरा, डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी