एफसीए और एफआरए के चुनिंदा मामले ही सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर किए हैं। मार्च में लगाई गई रोक अभी भी बरकरार है। गैर सरकारी कार्य दिवस पर विधायक जेआर कटवाल के संकल्प पर वन मंत्री की जगह शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने यह स्थिति स्पष्ट की। चर्चा के दौरान विधायकों ने एफसीए, एफआरए की मंजूरी न मिलने से सूबे में विकास कार्य रुकने का मामला उठाया। भाजपा विधायक राकेश पठानिया ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि वन विभाग में गार्ड से लेकर उच्च अधिकारी बदमाशी पर उतर आए हैं।
भारद्वाज ने एफआरए और एफसीए के चलते प्रदेश में विकास कार्यों के प्रभावित होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एफआरए और एफसीए के कारण विकास कार्यों पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सरकार इस मामले पर गंभीर है। मामले की सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के लिए प्रदेश सरकार ने सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता को अपना वकील बनाया है। प्रदेश का पक्ष अदालत में प्रभावी तरीके से रखा जा रहा है। उन्होंने सदस्यों की इस दलील को नकार दिया कि अदालत ने इस मामले पर दिए स्थगन को हटा दिया है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एफआरए और एफसीए की अनुमति के कुछ चुनिंदा मामलों में ही विकास कार्यों की अनुमति दी है। इससे पूर्व संकल्प प्रस्तुत करते हुए जेआर कटवाल ने कहा कि प्रदेश का 67 फीसदी हिस्सा कानूनी तौर पर वन क्षेत्र है। मंजूरियां न मिलने के चलते विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। उन्होंने इस स्थिति पर विचार करने और हल निकालने के लिए सदन की एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया। विधायक राकेश पठानिया ने कहा कि वन विभाग के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं है। विभाग विकास कार्यों के आड़े आ रहा है। गरीबों का शोषण किया जा रहा है।
अधिकारियों का रवैया नकारात्मक है। एक मंजूरी लेने में सालों लग जा रहे हैं। विभाग की इस कार्यप्रणाली से प्रदेश में औद्योगिक विकास होना मुश्किल है। उन्होंने अफसरों से सहयोगात्मक होने की अपील की। विधायक राकेश सिंघा और जगत सिंह नेगी ने आरोप लगाया कि वन विभाग एफआरए और एफसीए की आड़ में काम नहीं करना चाहता है। सरकार को गुमराह किया जा रहा है। विधायक आशीष बुटेल ने सरकार से कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखने की मांग की। विधायक आशा कुमारी, रमेश धवाला, रविंद्र कुमार ने भी अपना पक्ष रखा। अंत में विधायक जेआर कटवाल ने मंत्री के जवाब से संतुष्ट होकर संकल्प वापस लिया।