सियासी चौसर पर हमेशा किंग मेकर के रूप में राजनीतिक भूमिका निभाने वाले कांगड़ा ने इस बार भाजपा को बंपर 11 विधानसभा सीटें जिताकर दीं, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए सूबे का सबसे बड़ा जिला दावेदारी से दूर रहा। भाजपा के 11 विधायकों में से किसी ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावा पेश नहीं किया।
कांगड़ा भाजपा के पितामह कहे जाने वाले शांता कुमार ने भी सबसे ज्यादा सीटें देने वाले कांगड़ा जिले की मुख्यमंत्री पद के लिए पैरवी नहीं की। दो दशक पहले कांगड़ा जिले से शांता कुमार ने मुख्यमंत्री बनकर पानी वाले सीएम के रूप में पहचान बनाई थी। दो दशक से राजनीतिक रंगमंच पर गुटबाजी की भेंट चढ़े कांगड़ा को सीएम पद नहीं मिला।
इस बार विधानसभा चुनाव में कांगड़ा की जनता ने गुटबाजी को दरकिनार कर बंपर जनादेश भाजपा को दिया। सूबे में सबसे ज्यादा 11 सीटों का योगदान कांगड़ा ने दिया, लेकिन यहां से किसी भी नेता ने मुख्यमंत्री पद के लिए पैरवी तक नहीं की।
कांगड़ा में 11, मंडी में भाजपा को 9, कुल्लू से 3, हमीरपुर से 2, सोलन से 2, ऊना से 3, बिलासपुर से 3, शिमला से 3, सिरमौर से 3, चंबा से 4 और लाहौल-स्पीति से 1 सीट मिली। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से भाजपा को जनता ने 15 सीटें जिताकर दीं, लेकिन सबसे बड़ा जिला बड़े पद से महरूम रहा।