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बागवानों के लिए आदर्श मॉडल ही नहीं बना पाई कोई भी सरकार

Sat, 20 Apr 2019 10:07 PM IST
Krishan Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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amar ujala samvad - फोटो : अमर उजाला
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हिमाचल में सालाना चार हजार करोड़ के सेब कारोबार के बावजूद कोई भी सरकार अभी तक बागवानों के लिए आदर्श मॉडल पेश नहीं कर पाई। आलम यह है कि न तो सेब उत्पादक क्षेत्रों में सड़कें बन पाई हैं और न ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है।

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शनिवार को ‘अमर उजाला संवाद’ कार्यक्रम में पहुंचे शिमला जिले के बागवानों ने सेब उत्पादन में पेश आ रही चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की।  बागवानों ने बताया कि एक ओर सेब उत्पादन साल दर साल कम होता जा रहा है, दूसरी ओर विदेशी सेब के सामने मार्केट में हिमाचली सेब नहीं टिक पा रहा है।

बागवानों को तकनीकी प्रशिक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। आधी-अधूरी जानकारी से फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है। सेब पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने और सेब जूस को कोल्ड ड्रिंक में मिलाने की घोषणाएं भी हवाई साबित हुई हैं।
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बागवानी विभाग और अन्य संस्थानों की लचर कार्यप्रणाली से बागवान असंतुष्ट हैं। बागवानों ने ब्लॉक स्तर पर सेब पर आधारित प्रोसेसिंग यूनिट खोलने पर भी जोर दिया।

बागवानों ने अफसोस जताया कि उनकी जरूरतों के हिसाब से रासायनिक उर्वरकों और दवाओं की संस्तुतियां नहीं की जा रही है। अधिकांश बागवानों से ये संस्थान तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। 

सेब के उत्पादन और गुणवत्ता में आ रही कमी 

सरकारी तंत्र बागवानों तक नहीं पहुंच रहा। धड़ल्ले से केमिकल इस्तेमाल हो रहे हैं लेकिन कुप्रभावों को लेकर जागरूक नहीं किया जा रहा। सेब के उत्पादन और गुणवत्ता में कमी आ रही है। हमारे सीए स्टोर में विदेशी सेब है। विदेशी किस्मों की होड़ लगी है। सरकारी स्तर पर बागवानों के लिए कोई आदर्श मॉडल नहीं बनाया जा रहा है।- प्रेम चौहान, जलटाहर, कोटखाई

 बुनियादी सुविधाएं नहीं, एंटी हेलनेट पर सब्सिडी कम 
सेब बगीचों तक सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं। अधिकतर क्षेत्रों में बागवान बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। बागवानों को ओलों के रूप में मौसम की मार झेलनी पड़ रही है। एंटी हेलगन का फायदे के साथ नुकसान भी हुआ है। एंटी हेलनेट पर सब्सिडी कम है। फील्ड अफसर कुछ चुनिंदा बागवानों के हित ही देखते हैं।- संजीव देष्टा, सैंजी रोहड़ूू

टॉनिक के नाम पर बिक रहा कबाड़, कोई नियंत्रण नहीं
प्राइवेट कंपनियां पूरी तरह बाजार को नियंत्रित कर रही हैं। बाजार में बिक रही दवाओं पर सरकार या बागवानी विभाग का कोई नियंत्रण नहीं है। बाजार में टॉनिक के नाम पर कबाड़ बिक रहा है। बागवानों को तकनीकी जानकारी देने की कोई व्यवस्था नहीं है। बाजार में बिक रही दवाओं और टॉनिक के रेंडम सैंपल लेकर जांचे जाने चाहिए। - जोगेंद्र सिंह मच्छान, कुटाड़ा, रोहड़ूू

मदर ट्री तैयार किए बिना चल रहा कलमें बेचने का धंधा

कलमें बेचने का अवैध कारोबार बेरोक-टोक चल रहा है। मदर ट्री तैयार कर विश्वसनीय वायरस फ्री कलमें बेचने का प्रचलन नहीं है। हर जगह शॉर्टकट चल रहा। अवैध तरीके से बिक रही कलमें वायरस फैला रही हैं। बगैर सिंचाई के हम जो मर्जी दवाएं और रसायन छिड़क लें, फल में गुणवत्ता नहीं आएगी। सरकारों को इस पर ध्यान देना चाहिए।  - कुलदीप कांत शर्मा, बसमोल-कमाह, ठियोग

बिना लाइसेंस बेची जा रही बागवानी दवाएं
बागवानी के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाएं बिना लाइसेंस बेची जा रही हैं। सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। आईएसओ मार्कावाली दवाएं ही मार्केट में बेची जानी चाहिए। दवा कंपनियां बागवानों को गुमराह कर रही हैं। राजनीति के चलते सड़कें बदहाल हैं। ठियोग-खड़ापत्थर-हाटकोटी सड़क इसका उदाहरण है।- रोशन लाल जस्टा, कुंदली, कोटखाई

 टनल माफिया पर लगाम बड़ी चुनौती
कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि का उपजाऊपन खत्म हो रहा है। उत्पादन गिर रहा है। चंद सालों में नेपाली मजदूरों का संकट खड़ा होने वाला है। सड़कें बदहाल हैं लेकिन बड़े प्रोजेक्टों की बाढ़ है। बेलगाम टनल माफिया के कारण वाटर लेवल बिगड़ गया है, यह बागवानी के लिए बड़ी चुनौती है।- गोविंद चतरांटा, जुब्बल
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विशेष श्रेणी उत्पाद में शामिल हो सेब

सेब को डब्ल्यूटीओ के तहत विशेष श्रेणी उत्पाद में शामिल किया जाना चाहिए। पहले बैंक किसान क्रेडिट कार्ड बना रहे हैं, फिर इंश्योरेंस के नाम पर धोखा किया कर रहे हैं। अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए बिना जरूरत की दवाइयां बेची जा रही हैं। ड्रिप इरिगेशन जैसे कई विदेशी तकनीकें हमारे पास नहीं हैं।- हेमंत जिंटा, रोहड़ू
 
सिंचाई की कोई सुविधा नहीं, वायरस का भी खतरा
विदेशों से आयात सेब में वायरस का सबसे अधिक खतरा है। हमारे 80 फीसदी पुराने बगीचों में भी पांच तरह का वायरस है। बगीचों में सिंचाई का कोई साधन नहीं है, मौसम पर निर्भर रहना पड़ रहा है। विदेशी किस्म के सेब का अवैध आयात हो रहा है। बागवानों को तकनीकी जानकारी देना बेहद जरूरी है।- प्रशांत सेहटा, महासचिव ‘युगा’

आधारभूत ढांचा न होना बड़ी चुनौती
बागवानी के लिए आधारभूत ढांचा न होने सबसे बड़ी चुनौती है। फसल तैयार करने से लेकर मार्केटिंग तक सेब उत्पादकों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। प्रोसेसिंग यूनिट न होने कारण बागवानों के पास फसल बेचने के लिए विकल्प नहीं है। बागवानी के विकास के लिए सबसे पहले आधारभूत ढांचा तैयार होना चाहिए।- कांतिभूषण शर्मा, बमनोली, रोहडू़

दफ्तर के बाबू बन गए हैं एचडीओ
बागवानी विभाग के एचडीओ दफ्तरी बाबू बन गए हैं और फील्ड में जाने से गुरेज करते हैं। नई तकनीकों को लेकर बागवानों को जागरूक करने की जिम्मेदारी नहीं निभाते। सेब की नई वैराइटी को लेकर भेड़ चाल चल रही है। बिना ट्रायल बगीचों में नई वैराइटी लगाई जा रही है।- विकास चौहान, छहबीस, कुमारसैन
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