प्रशासन ने यह गलती तीसरी बार की है। इससे पहले 2005 व 2010 में भी इस पंचायत का प्रधान पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित किया गया था। उस दौरान भी कोई परिवार ओबीसी का नहीं था तो प्रधान पद के लिए चुनाव अन्य पंचायतों से आठ माह बाद हुआ था। उस समय उपप्रधान को ही की शक्तियां दी गई थीं, लेकिन अब तीसरी बार ओबीसी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। इस पंचायत के प्रतिनिधि कुछ माह पहले उपायुक्त सोलन से मिले थे और मांग की थी कि इस पंचायत को अनारक्षित किया जाए और पिछले कई वर्षों से यह पंचायत आरक्षित चल रही है लेकिन ओपन करना तो दूर इसे ओबीसी महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया।
बुखारी दा घाट गांव निवासी दुनी चंद ने बताया कि बार-बार एक ही गलती प्रशासन की ओर से की जा रही है जिससे यह पता चलता है कि रोस्टर बिना जांच किए ही बनाया जा रहा है। दो बार पंचायत के लोग यह परेशानी झेल चुके हैं। अमरू गांव के मान सिंह ने बताया कि पंचायत में एक भी परिवार ओबीसी का न होना और तीसरी बार इस पंचायत को ओबीसी महिला के लिए आरक्षित करने से चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। उधर, नालागढ़ के खंड विकास अधिकारी अरविंद कुमार ने बताया कि उन्होंने 22 अप्रैल को ही नालागढ़ में पदभार ग्रहण किया है। यह मामला उनके ध्यान में नहीं है। अगर यहां पर कोई परिवार नहीं है तो यहां पर प्रधान पद के लिए दोबारा चुनाव कराएं जाएंगे।
हिमाचल प्रदेश में सरकार पहले ही आर्थिक संकट झेल रही है। लेकिन नालागढ़ ब्लॉक की बुआसनी पंचायत में आरक्षण रोस्टर में लापरवाही के कारण प्रधान पद के लिए अलग से चुनाव करवाना पड़ेगा। इससे सरकार पर आर्थिक बोझ पड़ेगा। इससे पहले भी दो चुनाव में ऐसा हो चुका है।