हिमाचल के सिरमौर के जिला मुख्यालय नाहन से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भीतरकुईं गांव। यहां पहुंचने के लिए सतौन से लगभग 20 किलोमीटर का जोखिमभरा सफर शुरू होता है। घने जंगल के रास्ते लगभग चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद भीत्तरकुई गांव पहुंचें तो मानों जन्नत में आ गए। लेकिन, ग्रामीण इस जन्नत को छोड़ने के लिए विवश हैं।
कभी लगभग 100 लोगों की आबादी वाले इस गांव में अब मुश्किल से तीन परिवार के 12 लोग रह रहे हैं। कई पुश्तैनी मकान खंडहर बन गए हैं तो स्कूल लगभग सात साल पहले ही बंद हो गया है। कमोवेश, शिलाई विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले खुइनल, गाभर, कुलथीना, चंबियाला और पांवटा के कुलथीना गांव की भी यही स्थिति है। स्कूल की कमी और सड़क का अभाव ग्रामीणों को पलायन के लिए विवश कर रहा है।
आजादी के बाद भी सिरमौर जनपद के कई गांव सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाए हैं। गांव में कोई बीमार हो जाए तो उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए पहले तो कोटगा या पोका गांव वालों को फोन करके बुलाना पड़ता है। इसके बाद चारपाई पर उठाकर मरीज सड़क तक पहुंचाए जाते हैं। गांव वालों के लिए सस्ते राशन की दुकान लगभग 10 किलोमीटर दूर पोका में है तो अस्पताल लगभग 30 किलोमीटर दूर सतौन में।
सिंचाई सुविधा नहीं होने के कारण गांव की जमीन भी बंजर हो गई है। जबकि गैस सिलेंडर पहुंचने की संभावना न के बराबर है। अधिकतर लोग आज भी चूल्हा जलाकर भोजन पकाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव में कभी लोग अनाज खरीदने के लिए आते थे। लेकिन अब यहां कोई आने को तैयार नहीं है। पंचायत प्रधान शीला देवी ने कहा कि पैसे की कोई कमी नहीं है।
गांव में रास्ता भी बन गया है। वन क्षेत्र में रास्ता निर्माण को मनरेगा के तहत प्रस्ताव डाला गया है। लोनिवि के सहायक अभियंता विशाल भारद्वाज ने कहा कि कोटगा तक कच्ची सड़क बनकर तैयार है। जमीन की गिफ्ट डीड मिलने के बाद इस सड़क को पक्का कर दिया जाएगा। भीतरकुईं के लिए फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं आए हैं।
फ्यूज खराब हो तो दस दिन नहीं लगता
ग्रामीण दीप चंद, शुपा राम, सूखा देवी और धर्म सिंह ने बताया कि बिजली बिल भी यहां तक नहीं पहुंचाए जाते। अनुमानित आधार पर बिल दफ्तर में ही काट दिए जाते हैं। कभी सतौन से लेने पड़ते हैं तो कभी कोटगा से। एक फ्यूज खराब हो जाए तो दस दिन तक नहीं लगता। बरसात में पानी की पाइप लाइन टूटने पर कई दिनों तक पानी की दिक्कत रहती है। हालात यह है कि फसल की गिरदावरी तक के लिए अधिकारी गांव में नहीं आते। उन्हें कोटगा या सतौन बुलाया जाता है।
स्कूल-सड़क नहीं होने से पलायन
सतौन आकर रह रहे सुरेंद्र ने बताया कि गांव कोई छोड़ना नहीं चाहता। आज के दौर में शिक्षा का महत्व बढ़ गया है। बच्चों की पढ़ाई के लिए वह यहां आकर रह रहे हैं। गांव में रोजगार के भी कोई साधन नहीं है। कुछ साल पहले गांव में बादल फटने से लगभग 500 बीघा जमीन खराब हो गई। वह खेती लायक नहीं रही। उसके बाद रोजगार के भी साधन नहीं रहे। भूमि खराब होने का किसी को मुआवजा तक नहीं मिला।
कहां-क्या है पलायन की स्थिति
भीत्तरकुईं गांव में लगभग दस साल पहले 150 के लगभग लोग रहते थे। वर्तमान में यहां चार परिवार के लगभग 12 लोग रह रहे हैं। पूरा परिवार गांव में रह रहा है। किसी का बेटा बाहर है तो किसी का भाई। सब रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों को पलायन कर चुके हैं। खुइनल गांव में भी कुछ साल पहले करीब 14 परिवारों के 70-80 लोग रहते थे। अब यहां महज 10 परिवार रह गए हैं। इन परिवारों में भी बुजुर्ग ही गांवों में रह रहे हैं। गाभर गांव 20 परिवारों का हुआ करता था। अब यहां करीब 10 ही परिवार रह रहे हैं।
3400 में बेचा अदरक, 2700 लगा किराया
गांव के युवा कपिल ने बताया कि इस सीजन में उन्होंने अदरक की खेती की थी। लगभग 17 मण अदरक उन्होंने विकासनगर में जाकर बेचा। जिसके उन्हें कुल 3400 रुपये मिले। इसमें से लगभग 2700 रुपये उन्होंने किराये पर ही खर्च किए। अब करीब 100 मण अदरक उन्होंने दबाकर रखा हुआ है।
वन विभाग ने रोका था सड़क का काम
1. शिलाई के विधायक बलदेव तोमर कहते हैं कि सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ था। लगभग 200 मीटर तक सड़क बनने के बाद वन विभाग की जमीन होने के चलते कार्य रोका गया। गाभर, खुइनल की भी यही स्थिति है। कई इलाकों में ग्रामीण सड़क निर्माण को जमीन भी नहीं दे रहे। वन विभाग से एनओसी लेकर गांव के लिए सड़क बनाई जाएगी।
2. पूर्व विधायक एवं रोजगार सृजन बोर्ड के अध्यक्ष हर्षवर्धन चौहान ने बताया कि सड़क के लिए दो लाख रुपये उन्होंने दिए थे। लेकिन, वन विभाग ने काम रुकवा दिया। गाभर और भीतरकुईं में सड़क निर्माण के लिए विभाग को आदेश दिए गए हैं।