हिमाचल में बंदर आतंक का पर्याय बन गए हैं। प्रदेश के 12 में से 11 जिलों में लोग बंदरों से परेशान हैं। शहरों से लेकर गांवों तक बंदर आतंक मचा रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में उत्पाती बंदर जहां सरेबाजार लोगों पर हमले कर रहे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में इस जानवर ने खेती को तबाह कर दिया है। घरों में घुसकर बंदर लोगों पर हमले कर रहे हैं।
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बंदरों के हमले से कई लोगों की जान जा चुकी है सैकड़ों लोग घायल हो चुके हैं। राजधानी शिमला समेत कई क्षेत्रों में बंदरों के कारण जालियां लगाकर घरों को पिंजरे में तबदील कर दिया है। बंदर बाहर खुले में घूम रहे हैं और लोग घरों में कैद हैं। तेजी से बढ़ रही बंदरों की तादाद से कई रिहायशी क्षेत्र ‘मंकी सेंक्चुरी’ की तरह प्रतीत होते हैं।
हर चुनाव में बंदर हिमाचल में मुद्दा बनते रहे हैं। सभी दल इस पर खूब सियासत करते हैं, लेकिन चुनावी शोर खत्म होते ही प्रदेश की जनता को बंदरों से जूझने को छोड़ दिया जाता है। आलम यह है कि कई जगह बंदरों के चलते लोगों का अकेले घरों से बाहर निकलना ही मुश्किल हो गया है।
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खेती चौपट, किसानों को बना दिया मजदूर
प्रदेश में बंदरों के आतंक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूबे के कई गांवों में लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है। प्रदेश की करीब दो दर्जन पंचायतों में तो खेत पूरी तरह से ही उजड़ गए हैं। हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष डा कंवर सिंह तंवर कहते हैं कि वर्तमान में तो लाहौल स्पीति को छोड़कर प्रदेश के हर जिले में बंदर बड़ी समस्या बन गए हैं।
बंदरों के आतंक से ही हजारों किसान बागवान खेती बागवानी छोड़ रहे हैं। मक्की के अलावा सब्जियों और फलों की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। सिरमौर समेत कई इलाकों से बड़ी संख्या में किसान खेती छोड़ मजदूर बन गए हैं।
वेजिटेबल बेल्ट पर मार, बीबीएन बेहाल
प्रदेश के वेजिटेबल बेल्ट के रूप में पहचान रखने वाले सोलन में टमाटर, मटर, शिमला मिर्च जैसी नकदी फसलें ही नहीं मक्की, गेहूं और दाल के खेत भी आए दिन बंदर उजाड़ रहे हैं। बंदरों की इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित बीबीएन क्षेत्र है।
यहां रामशहर व कुठाड़ इलाके के कई गांवों में लोग खेती करना छोड़ चुके हैं। करीब 50 एकड़ से ज्यादा उपजाऊ जमीन पर बंदरों की दहशत का असर दिखता है। लोगों का आरोप है कि ऊपरी क्षेत्र से बंदर पकड़कर सोलन में छोड़ दिए जाते हैं। हरियाणा से सटे परवाणू क्षेत्र में खडिंग और शेरला गांव में भी यही हाल है।
विदेशी पर्यटक समेत दो गंवा चुके जान
जिला में बंदरों का आतंक अब तक दो जानें ले चुका है। कई लोग घायल हुए हैं। हाल में मंडी के पैलेस वार्ड में 62 वर्षीय बुजुर्ग की बंदरों के हमले में मौत हो गई। जबकि रिवालसर में करीब दो साल पहले बंदरों के हमले से जमीन पर गिरी विदेशी महिला की जान चली गई थी। सरकाघाट, धर्मपुर, जोगिंद्रनगर, बल्ह, डैहर, पधर और सुंदरनगर में बंदर किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं।
करोड़ों खर्चने के बाद भी समस्या जस की तस
हिमाचल में बंदरों की समस्या से निजात दिलाने के लिए लगभग 25 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। वन विभाग पिछले दस साल में करीब सवा लाख बंदरों की नसबंदी का दावा कर रहा है। यह भी दावा है कि नसबंदी की वजह से बंदरों की संख्या कम हुई है लेकिन
धरातल पर तस्वीर कुछ और ही है। विभाग की इस कवायद में अब तक औसतन एक बंदर पर दो हजार रुपये के हिसाब से करीब 25 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इसमें नसबंदी केंद्र स्थापित करने के साथ बंदरों को पकड़ने और उनको रखने का खर्च शामिल है।
सिर्फ नसबंदी नहीं है इस मर्ज का इलाज
पूर्व आईएफएस अधिकारी केके गुप्ता कहते हैं कि बंदरों का आतंक खत्म करने की विभाग की रणनीति ही सही नहीं है। वह कहते हैं कि बंदरों की नसबंदी और उनके एक्सपोर्ट को एक साथ करना जरूरी है।
साथ ही बंदरों को वर्मिन घोषित करने के बाद अगर लोगों की मदद ज्यादा आतंक वाले स्थानों पर बंदरों को मारने में परोक्ष रूप से की जाए तो भी हालात संभल सकते हैं। नसबंदी एक लंबी प्रक्रिया है जिसका असर दिखने में समय लगेगा।
वर्मिन घोषित होने पर भी नहीं मारे बंदर
उत्पाती बंदरों को ठिकाने लगाने के लिए प्रदेश के 38 शहरों में बंदरों को वर्मिन घोषित किया गया था। वर्मिन घोषित जीवों को मारने का प्रावधान है। इस पर विभाग ने कार्रवाई के पहलु को लोगों पर छोड़ दिया। इस उम्मीद के साथ कि जिनकी समस्या है वही बंदरों को मारेंगे।
एक वर्ष की अवधि के भीतर एक भी बंदर मारे जाने की सूचना नहीं मिली। इसके पीछे धार्मिक आस्था और विभाग की उदासीनता को वजह माना गया। नतीजा ये हुआ कि वर्मिन घोषणा की मियाद बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। अब विभाग ने वर्मिन घोषणा के लिए फिर से केंद्र को पत्र लिखा है।
हजारों को मिल चुके हैं जख्म
पिछले दस साल में प्रदेश में हजारों की संख्या में लोग घायल हो चुके हैं। बंदरों के हमले में घायल लोगों को विभाग की ओर से ही लाखों रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है। लेकिन विभाग भी मुआवजा देकर अपनी खानापूर्ति कर रहा है जबकि बंदरों की समस्या पर उसकी हर रणनीति फेल ही साबित हो रही है।
बंदरों के उत्पात और जान माल को पहुंचाने वाले नुकसान को रोकने के लिए वन विभाग ने कई अहम कदम उठाए हैं। पिछले पांच साल के आकंड़े देखें तो बंदरों के हमलों में कमी हुई है। बंदरों की आबादी नियंत्रित करने के वैज्ञानिक प्रयासों का असर भी सामने आने लगा है। कृषि और बागवानी को पहुंचने वाले नुकसान को कम करने की कोशिशें जारी हैं, जल्द बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे। - ठाकुर सिंह भरमौरी, वन मंत्री
प्रदेश में बंदरों के आतंक से 25 प्रतिशत लोग खेतीबाड़ी छोड़ चुके हैं। बंदरों को पकड़ने और उनकी नसबंदी में बड़ा घोटाला हुआ है। न तो बंदरों की आबादी घटी, न ही उनके आतंक पर नियंत्रण पाया गया। बंदर ज्यादा खूंखार हो गए हैं। महिलाओं और बच्चों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं।
प्रदेश सरकार को केंद्र की कई ब्लॉकों को वर्मिन घोषित करने की मिली अनुमति पर भी कोई काम नहीं हुआ। एक भी बंदर नहीं मारा गया, जिसके चलते अनुमति की अवधि नहीं बढ़ी। कांग्रेस सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह फेल साबित हुई है। -राजीव बिंदल, प्रमुख प्रवक्ता प्रदेश भाजपा