झील के एक छोर पर कार्तिक स्वामी का चेला रखवाली के लिए रुक गए। इस दौरान पवित्र डल की पूजा-अर्चना की गई। डल तोड़ने से पूर्व बलि की परंपरा थी लेकिन, न्यायालय के आदेश के बाद बलि के बजाय कच्चा नारियल काटकर झील में फेंका गया।
इसके बाद एक साथ हाथ पकड़कर शिव चेले झील में उतरे। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं भीड़ उमड़ गई। डल झील पार करने के बाद शिव भक्तों ने शिव चेलों को कंधों पर उठाकर बैठने के स्थान तक पहुंचाया।
मान्यता है कि त्रिलोचन महादेव के वंशज शिव चेलों को कंधों पर उठाने से हर मनोकामना पूरी होती है। उल्लेखनीय है कि आधिकारिक तौर पर 24 अगस्त से शुरू हुई मणिमहेश यात्रा 6 सितंबर को संपन्न हो जाएगी।
मान्यता है कि पवित्र झील में चेलों व यात्रियों द्वारा फेंके जाने वाले फलों को पकड़ने वाले यात्रियों की हर इच्छा शंकर भगवान पूरी करते हैं। आज भी यह मान्यता लोगों में विद्यमान है।
वहीं, डल के साथ ही काली माता की झील भी है। यहां पर शिव चेलों सहित यात्रियों के स्नान करने पर पाबंदी है। कुछ वर्ष पूर्व यहां पर यात्री स्नान करने के लिए उतर गए थे, जिनके शव कई दिनों बाद मिले थे।