फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉक्टरों का खुलासा, अब इस वजह से बढ़ रहे हैं टीबी के मरीज

Tue, 27 Dec 2016 11:57 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
विज्ञापन
विज्ञापन
हिमाचल के 11 जिले देश के टॉप 100 टीबी ग्रस्त जिलों में हैं। संक्रामक बीमारी होने से इसके फैलने की ज्यादा संभावना होती है। यही कारण है कि प्रदेश में टीबी के मरीजों की संख्या बढ़ी है।
विज्ञापन


हालांकि, मरीजों की संख्या से ज्यादा प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के राज्य टीबी प्रोग्राम के अफसरों को सामान्य टीबी के साथ टीबी की दूसरी और तीसरी स्टेज के मरीजों के बढ़ने से चिंता सता रही है। इसमें मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी वाले मरीज ज्यादा चिंता का विषय हैं।

एक साल में सूबे में सामान्य टीबी के करीब दस हजार मरीज, पांच सौ एमडीआर टीबी के रोगी सामने आए हैं। एक्सटेंसिव ड्रग रेसिस्टेंस वाली टीबी के 18 मरीज सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों की मानें तो सामान्य टीबी को छह महीने के रेगुलर कोर्स से खत्म किया जा सकता है।
विज्ञापन


एमडीआर टीबी रोधक कोर्स में दवाओं का डोज भी ज्यादा होती है। मौत की संभावना भी 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। एक्सडीआर में तो मरीज को बचाना नामुमकिन होता है। यही कारण है कि टीबी अधिकारी बीमार मरीजों को कोर्स पूरा करने के लिए ज्यादा जोर दे रहे हैं।

इसलिए बढ़ रहे हैं एमडीआर के मरीज

बरिया ने बताया कि सामान्य रूप से लोगों में टीबी होने पर छह महीने का कोर्स चलाकर बीमारी को खत्म किया जा सकता है। इलाज शुरू होने पर कई बार लोग थोड़ी सी राहत महसूस होने पर दवा लेना बंद कर देते हैं। चूंकि, इस दौरान वायरस मौजूद रहते हैं।

वह सामान्य टीबी वाली दवा को झेलने में सक्षम हो जाते हैं, जिसकी वजह से ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। बीच में इलाज छोड़ने के बाद मरीज खुद तो एमडीआर टीबी से ग्रस्त हो जाता है, साथ ही उसके आसपास आने वाले लोगों में भी सामान्य की बजाय सीधे एमडीआर श्रेणी की टीबी हो जाती है।
विज्ञापन

डिटेक्शन रेट अच्छा, इसलिए ज्यादा है मरीजों की संख्या

राज्य टीबी प्रोग्राम अधिकारी डॉ. आरके बरिया ने बताया कि प्रदेश में टीबी के मरीज का पता लगाने का प्रतिशत 79 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय स्तर 63 फीसदी है। डिटेक्शन रेट ज्यादा होने से हिमाचल में मरीजों की संख्या सरकारी तौर पर ज्यादा है। कुल्लू, लाहौल-स्पीति और किन्नौर को छोड़ दें तो बाकी जिलों में सीबीएनएएटी मशीन लगी है। इसकी बदौलत टीबी को डिटेक्ट करने में आसानी होती है।

24 महीने का हो जाता है कोर्स
टीबी प्रोग्राम अधिकारी ने बताया कि सामान्य टीबी का कोर्स छह महीने का होता है। एमडीआर टीबी रोधक कोर्स 24 से 27 महीने का होता है। चार महीने तक हर रोज इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इसके बाद लगातार दवा खानी होती है। इस प्रक्रिया के बाद ही मरीज के बचने की संभावना होती है। इसमें भी अगर मरीज कोर्स बीच में छोड़ दे तो वह एक्सडीआर टीबी ग्रस्त हो जाता है। इसके बाद उसका बचना असंभव होता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें