हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने सोमवार को विधानसभा में नया लोकायुक्त विधेयक का ड्राफ्ट सदन में रखा। इस विधेयक को उत्तराखंड, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में तैयार किए गए लोकायुक्त विधेयक का अध्ययन करने के बाद तैयार किया गया है।
लोकायुक्त से सालाना 4.34 करोड़ रुपये का वित्तीय भार पड़ेगा। इसके बाद मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने तत्कालीन भाजपा सरकार की ओर से 2012 में पास किए गए लोकायुक्त विधेयक को वापस ले लिया। सरकार का दावा है कि पुराने लोकायुक्त विधेयक से मौजूदा लोकायुक्त विधेयक अधिक सशक्त होगा।
इस विधेयक के दायरे में मुख्यमंत्री तक को लाया गया है। लोक सेवकों से लेकर मुख्यमंत्री तक पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर लोकायुक्त के पास मामला चलाया जा सकता है। 159 पेजों की ड्राफ्ट रिपोर्ट में तमाम बिंदुओं को शामिल किया गया है। तीन सदस्यों से मिलकर लोकायुक्त बनाया जाएगा।
इसका अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रहा हो। इसके अलावा दो सदस्य होंगे, जिसमें एक न्यायिक सदस्य होगा। तीसरा सदस्य संसद या विधानसभा का सदस्य नहीं होगा।
क्या होगी लोकायुक्त की शक्तियां
-पर्यवेक्षण संबंधी शक्तियां
-तलाशी और अभिग्रहण
-सिविल न्यायालय की तरह शक्ति
-अफसरों के सेवाओं का उपयोग करना
-प्रापर्टी की अंतिम कुर्की करना
-प्रापर्टी कुर्की की पुष्टि करना
-भ्रष्टाचार पर लोक सेवक का तबादला या निलंबन
-जांच के दौरान अभिलेख को नष्ट न करने का निर्देश
प्रवर समिति के सभापति कौल सिंह ठाकुर ने बताया कि पुराने लोकायुक्त विधेयक से नया लोकायुक्त विधेयक मजबूत है। इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाने में आसानी होगी।
नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि नया लोकायुक्त विधेयक लाने की जरूरत ही नहीं है। इसमें कमियां थी तो पुराने में संशोधन किया जाना चाहिए था। लोकायुक्त को कमजोर करने के लिए नया विधेयक लाया जा रहा है।