लेकिन एक बात तो तय है कि जिस तरह से मंडी में नामांकन के दिन सुखराम परिवार ने भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन किया है, उससे सुखराम ने साख मनवाई है। वहीं एक मंच पर वीरभद्र और सुखराम का साथ होना और महज तीन मिनट के भाषण में कहना कि समझदार को ईशारा ही काफी है, बाकि बोल चुके मैं दोहराऊंगा नहीं, दोहराना बुद्धिमता नहीं और इसके बाद आश्रय के लिए वोट मांगना, वीरभद्र के इस व्यवहार के भी कई मतलब निकल रहे हैं।
वहीं भीड़ जुटाने के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं। भाजपाई इसे किराये की भीड़ करार दे रहे हैं। हालांकि चुनावी परिणाम ही बताएगा कि नामांकन के दिन जुटाई भीड़ किराये की भीड़ थी या जीत की पृष्ठभूमि।