भाजपा का मार्गदर्शक मंडल धीरे-धीरे अपने तरकश से तीर निकालने लगा है। मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग के बाद अटल कैबिनेट के सबसे भरोसेमंद केंद्रीय मंत्री रहे शांता कुमार ने भी इशारों-इशारों में 75 की आयु के फॉर्मूले पर निशाना साधा है।
शांता ने कहा कि अगर पार्टी कार्यकर्ता के तौर पर मैं देखूं तो 75 की आयु पार कर चुके उम्मीदवारों को टिकट न देने का फैसला सही है, लेकिन एक लेखक के तौर पर वह पार्टी के इस निर्णय से कभी भी सहमत नहीं कि 75 साल की आयु के बाद कोई भी कार्यकर्ता राजनीति नहीं कर सकता।
धर्मशाला में पत्रकारों से रूबरू सांसद शांता कुमार ने चुनावी राजनीति को अलविदा कह दिया। उन्होंने कहा कि अब वह विवेकानंद ट्रस्ट के साथ बुजुर्गों की सेवा कर अपना जीवन बिताएंगे।
वहीं, उन्होंने भाजपा प्रत्याशी किशन कूपर को अपना छोटा भाई करार देते हुए उन्हें पूरा समर्थन देने की बात कही। शांता ने कहा ‘लोग समझें कि कपूर नहीं मैं चुनाव लड़ रहा हूं।’
चुनाव के वक्त योग गुरु रामदेव की चुप्पी ठीक नहीं
फाइल फोटो
उन्होंने कहा कि चुनाव के वक्त योग गुरु रामदेव मौन हैं। ऐसे वक्त पर उनकी चुप्पी ठीक नहीं है। वे खुद उनसे कहेंगे कि भाजपा के लिए प्रचार करें। वहीं, उन्होंने कहा ‘मेरा और वीरभद्र सिंह का एक ही सिद्धांत है।
राजनीतिक पार्टी से बड़ी सिद्धांत की राजनीति होती है। हम दोनों नेता सिद्धांत की राजनीति पर काम कर रहे हैं। हम दोनों की पार्टियां हारती और जीतती रहीं, लेकिन कभी भी पार्टी छोड़ने का ख्याल दोनों के मन में नहीं आया।’
सुखराम पर हमला, निष्कासित होंगे अनिल
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शांता ने दलबदल की राजनीति पर प्रहार करते हुए कहा कि अपना हित साधने के लिए नेता एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाते हैं। ये वही नेता होते हैं, जो भ्रष्टाचार कर देश को बरबाद कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सुखराम का परिवार मात्र सत्ता का भूखा है। इसी का नतीजा है कि उनका परिवार पांच बार पार्टियां बदल चुका। उन्होंने कहा कि सुखराम के बेटे अनिल शर्मा को भाजपा निष्कास्ति करेगी, क्योंकि वह पार्टी के आदेशों को नहीं मान रहे हैं।
चुनावी सीजन में नेताओं की लग रही बोलियां
शांता ने कहा कि आजकल नेताओं की मंडियां लगी हैं। चुनावी सीजन में इन नेताओं की बोलियां लगाई जा रही हैं। कांग्रेस उधार के प्रत्याशियों के साथ लोकसभा चुनाव जीतने का ख्वाब देख रही है, जो कभी पूरा नहीं होगा। जिस पार्टी के अपने प्रत्याशी ही नहीं, वे चुनाव कैसे जीत सकते हैं।