एचपीयू में आयोजित अपराजिता कार्यक्रम में प्रो. जिंटा ने दिए तनाव मुक्त जीवन जीने के टिप्स
बोले, हर रोज लगाएं ध्यान और मोबाइल का कम करें इस्तेमाल
अमर उजाला ब्यूरो शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला के गार्गी कन्या छात्रावास में अमर उजाला के अपराजिता अभियान के तहत वीरवार को कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं चीफ वार्डन प्रो. आरएल जिंटा इसमें मुख्य वक्ता रहे। प्रो. जिंटा ने कहा कि मनुष्य के मस्तिष्क का 75 फीसदी भाग अचेतन अवस्था में रहता और 25 फीसदी चेतन अवस्था में होता है। चेतन अवस्था में से हम सिर्फ दस फीसदी का ही उपयोग करते हैं। कहा कि जो व्यक्ति दस फीसदी से अधिक अपने दिमाग का उपयोग करना सीख गया उसके लिए कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं। इच्छाओं को सीमित करना जरूरी है। यही तनाव और चिंता का मूल कारण है।
कॅरिअर और
परीक्षा को लेकर जो भी चिंता तथा तनाव है, उसके लिए जरूरी है कि हम अपने जीवन में समय का प्रबंधन कर काम बांट कर आगे बढ़ें। चिंता, तनाव और गुस्से को नियंत्रित करने के लिए ध्यान लगाएं। अपनी चिंता को दूसरों के साथ साझा करें। मोबाइल का अधिक उपयोग ध्यान को भटकाता है, इसलिए इसका कम उपयोग करें। कार्यक्रम का संचालन वार्डन डाॅ. सुनीता ने किया और मंच का संचालन दीक्षा ने किया।
सोशल मीडिया का करें सही इस्तेमाल : डॉ. शालिनी
विधि विभाग की डाॅ. शालिनी कश्मीरिया ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध और उसे रोकने के लिए बनाए कानूनों के बारे में जानकारी दी। कहा कि महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के अपराध होते हैं। सोशल मीडिया का उपयोग करते हुए हमेशा ध्यान रखें कि आपका एक क्लिक आपकी और दूसरों की मुश्किल बढ़ा सकता है। लापरवाही बरतने पर आपका एक क्लिक आपको कानूनी उलझनों में फंसा सकता है।
ग्रामीण महिलाओं को करें जागरूक : डॉ. दीपाली
विवि की अतिरिक्त चीफ वार्डन एवं इंग्लिश विभाग की प्रोफेसर डॉ. दीपाली धौल ने कहा कि महिला सशक्तीकरण का लाभ तभी है जब जागरूक महिलाएं गांवों में जाकर गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करें। शोधार्थी दीक्षा के पूछे सवाल पर डाॅ. शालिनी ने कहा कि अपराध सहन करने की आदत न डालें। आपके साथ जब कोई गलत करने लगता है तो उसे शुरू में ही रोक दें। शोधार्थी रूपाली के सवाल पर कहा कि अगर महिलाओं को कार्यालय में सूचनाएं नहीं दी जाती हैं तो यह लैंगिक भेदभाव है और मानसिक उत्पीड़न की श्रेणी में आ सकता है। इसकी शिकायत संस्थान के स्तर पर बनी कमेटी से करें।