केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि उत्तर भारत में पुस्तक पढ़ने का प्रचलन बहुत कम है। पूर्व और दक्षिण भारत में पुस्तक पढ़ने में लोगों की ज्यादा रुचि दिखाई देती है। पुस्तक मेलों में उत्तरी भारत की अपेक्षा पूर्व और दक्षिण भारत में लंबी लाइनें लगती हैं।
उन्होंने कहा कि भारत पर जितने भी आक्रमण हुए, वह अधिकतर उत्तरी भारत से होकर ही हुए। शायद पुस्तक पढ़ने की बजाय लोग अपनी जान बचाने पर ज्यादा ध्यान देते थे। इसी कारण पुस्तक पढ़ने का प्रचलन यहां कम रहा होगा।
शनिवार को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के धर्मशाला पुस्तक मेले के शुभारंभ पर बतौर मुख्यातिथि आए कुलपति प्रो. अग्निहोत्री ने कहा कि पुस्तक ज्ञान को एक जेनरेशन से दूसरी जेनरेशन तक पहुंचती है। फिर भी धीरे-धीरे पुस्तक पढ़ने का प्रचलन कम हो रहा है।
हर व्यक्ति अपने साल का बजट बनाकर रखता है, लेकिन इस बजट में पुस्तक खरीदने के लिए कोई स्थान नहीं होता। पुरानी पुस्तकों को दो कप लेकर रद्दी वालों को बेच दिया जाता है। ऐसे में प्रतीत होता है कि पुस्तकों से ज्यादा कीमती हमारे लिए कप हैं।
जिस दिन पुस्तकें हमें कप से कीमती लगेंगी, उसी दिन से इसका प्रचलन बढ़ जाएगा। वहीं, राष्ट्रीय पुस्तक न्याय के पूर्व अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि ई-बुक्स प्रिंट पुस्तकों का विकल्प नहीं हैं। ई-पुस्तक प्रिंट पुस्तकों की सहयोग हो सकती हैं।
शायद इसी का नतीजा है कि ई-बुक्स में 12 प्रतिशत की कमी आई है। भारतीयों के मन में अभी भी छपी हुई पुस्तकें ज्यादा रहती हैं। शुभारंभ अवसर पर कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की लिखित भारत बौद्ध का संघर्ष, अहमदिया मुस्लिम कम्युनिटी की वर्ल्ड क्राइसेस एडं द पाथवे टू पीस और लाइफ ऑफ मोहम्मद का विमोचन भी हुआ।
शुभारंभ अवसर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार की निदेशक (राजभाषा) सुनीति शर्मा, हिमाचल के साहित्यकार डॉ. प्रत्यूष गुलेरी और डॉ. गौतम शर्मा व्यथित बतौर विशेष अतिथि मौजूद रहे।