इस अलर्ट सिस्टम में भूस्खलन वाले इलाकों में सेंसर लगाए जाते हैं। ये सेंसर पहाड़ी के दरकने या हिलने की तरंगों को समय रहते भांपकर आसपास के क्षेत्र के लोगों को एसएमएस भेजते हैं।
इंटरनेट के माध्यम से जिला प्रशासन को अलर्ट भेजने के बाद खतरे के सायरन बजते हैं। संयंत्र को ईजाद करने वाले प्रशिक्षु इंजीनियरों के मार्गदर्शक आईआईटी मंडी के कंप्यूटर एवं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. वरुण दत्त ने कहा इस
तकनीक के सफल परीक्षण के बाद इसके पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया गया है। अगले चरण में संस्थान का स्टार्टअप अन्य पहाड़ी राज्यों में सरकारों से संपर्क करेगा। इसके लिए मुकम्मल योजना तैयार कर ली गई है।
गौर हो कि अगस्त 2017 में मंडी के कोटरोपी में भूस्खलन से 48 लोगों की जान चली गई थी। आईआईटी के प्रशिक्षुओं ने इसी घटना से प्रेरणा लेकर इस सिस्टम को तैयार किया। मंडी जिले में यह संयंत्र मंडी-पठानकोट एनएच और मनाली-चंडीगढ़ एनएच पर 10 जगहों पर लगाए गए हैं।
एक सर्वे के अनुसार भारत में हर साल लगभग 200 लोग भूस्खलन में जान गंवा देते हैं। इससे बुनियादी सुविधाओं के नुकसान की भरपाई पर सालाना औसतन 550 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।
स्वदेशी तकनीक से बने चेतावनी तंत्र की कीमत केवल 20 हजार रुपये है। इसे लैंडस्लाइड प्रोन एरिया में स्थापित किया जाता है। यह सिस्टम इलाके की मिट्टी की मूवमेंट की अलग-अलग तीव्रता को भांप कर स्थानीय (ब्लिंकर और हूटर के माध्यम से) और एसएमएस से प्रशासन और संबंधित विभाग को चेतावनी संकेत देता है।
यहां लगे हैं अलर्ट सिस्टम
मंडी जिले के विभिन्न भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में 10 सिस्टम लगाए हैं। पठानकोट एनएच पर एक नारला गांव में, दो कोटरोपी गांव और दो गुम्मा गांव में लगाए गए हैं। मनाली-चंडीगढ़ एनएच पर देवड़े, हनोगी, थलौट, दवाडा और पंडोह में एक-एक सिस्टम लगाया गया है। भूमि में हलचल होने पर संयंत्र से मिलने वाले इन मानकों को वेबसाइट पर ऑनलाइन पढ़ा जा सकता है। यह जानकारी टेबल और ग्राफिक्स दोनों फार्मेट में उपलब्ध है।