सूखा लंबा चला तो चिलिंग ऑवर्स नहीं हो पाएंगे पूरे, करोड़ों रुपये के सेब कारोबार पर मंड़ाया संकट
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नवंबर-दिसंबर की बारिश-बर्फबारी मानी जाती है संजीवनी संवाद न्यूज एजेंसी शिमला। बारिश न होने के कारण बगीचों से नमी गायब गई है। सेब बहुल ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमपात से पूर्व सेब के बगीचों के प्रबंधन का कार्य बागवान निपटाना चाहते हैं, ताकि समय पर सेब के बगीचों के कार्य पूरे हो सकें लेकिन सूखे के चलते प्लम और सेब के बगीचों में यह सभी कार्य अटक गए हैं।
तीन माह से लगातार चल रहे सूखे (शुष्क मौसम) के कारण बागवान पेड़ों में तौलिए नहीं बना रहे हैं, न ही खाद और गोबर का इस्तेमाल कर पा रहे हैं। यही हाल मध्य और निचले सेब बाहुल क्षेत्रों के बागवानों के हैं। बागवानों को चिंता सताने लगी है कि कहीं सूखा लंबा चला तो चिलिंग ऑवर्स पूरे न होने से सेब उत्पादन में कमी आ सकती है। रोहड़ू के बागवान देवीचंद और कर्म सिंह ने बताया कि नवंबर और दिसंबर की बारिश और बर्फबारी बागवानी के लिए संजीवनी मानी जाती है, लेकिन लंबे समय से चल रहे सूखे के कारण जमीन से नमी गायब है और बगीचों के कार्य शुरू नहीं हो रहे हैं।
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बागवान पूरी तरह से हताश हैं। दिसंबर में बगीचों में फास्फोरस और पोटाश खाद डाली जाती है, लेकिन इसके लिए जमीन में नमी होना जरूरी है। इन खादों से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मजबूत होती है। समय पर बर्फबारी और बारिश न होने से आगामी समय में करोड़ों के सेब कारोबार पर संकट खड़ा हो सकता है, वहीं सेब के पेड़ाें में कैंकर सहित अन्य बीमारियों का खतरा भी ज्यादा बढ़ सकता है। सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष सोहन ठाकुर ने कहा कि बारिश-बर्फबारी न होने से सूखे के कारण खाद डालने का काम रुक गया है। अगले एक से दो हफ्ते में भी बारिश-बर्फबारी नहीं हुई तो सेब की फसल बुरी तरह प्रभावित होने का डर है।
1200 घंटे चिलिंग ऑवर्स जरूरी
सेब के पौधों के लिए 7 डिग्री से कम तापमान में 1000 से 1200 घंटे चिलिंग ऑवर्स की जरूरत रहती है। चिलिंग ऑवर्स पूरे न होने इसका असर फ्लावरिंग पर पड़ता है। पौधों में एक समान फ्लावरिंग नहीं होती। कमजोर फ्लावरिंग से फूल झड़ जाते हैं। इससे सेब उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
कोट
सिंचाई की सुविधा को देखते हुए करें तौलिये बनाना शुरू
उद्यान विभाग शिमला की उपनिदेशक सुदर्शना नेगी ने किसानों को सलाह देते हुए कहा है कि मौसम की परिस्थिति को देखते हुए उन बागवानों को तौलिये बनाने और खाद डालने का कार्य शुरू करना चाहिए जिनके पास सिंचाई की बेहतर सुविधा हो, ताकि मिट्टी में उपलब्ध नमी प्रभावित न हो। बागवान तौलिए में डालने के बजाए अपने बगीचों तक पहुंचा कर रख सकते हैं ताकि बारिश होने के बाद उसे तौलिए में डालकर मिट्टी में मिलाया जा सके। ...सुदर्शन नेगी, उप निदेशक, उद्यान विभाग शिमला