कथित चीनी जासूस के रूप में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहने वाले तिब्बती बौद्ध धर्म के तीसरे सबसे बड़े शक्तिशाली काग्यू सेक्ट (मठ एवं स्कूल) के मुखिया धर्मगुरु करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे भारत आने के बाद पहली बार अपने गुरु ताई सितु रिंपोछे से शुक्रवार को भट्टू बौद्ध मठ में मिले।
चीनी जासूस होने के आरोपों और संदेह के चलते भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की ओर से दोनों के मिलन पर प्रतिबंध हटने के बाद पहली बार शुक्रवार को करमापा के गुरु के बैजनाथ के भट्टू स्थित शेराबलिंग बौद्ध मठ में ऐतिहासिक क्षण आया। दोनों के मिलन पर प्रतिबंध हटने के बाद शुक्रवार को 55 किलोमीटर की दूरी 16 साल बाद आखिरकार खत्म हो ही गई।
16 साल में एक बार नहीं मिल पाए
भारत आने के बाद करमापा अपने ही गुरु से पिछले 16 साल में करीब रहकर भी एक बार नहीं मिल पाए थे। प्रतिबंध हटने के बाद करमापा को उनके गुरु ने भट्टू बौद्ध मठ में बुद्धिस्ट सांस्कृतिक कार्यक्रम सेचु नृत्य में आमंत्रित किया है।
करमापा भट्टू में 11 दिसंबर तक अपने गुरु के साथ रहेंगे। इस दौरान करमापा और उनके गुरु शिक्षा ग्रहण कर रहे लामाओं व विदेशियों को टीचिंग भी देंगे। इससे पहले दलाईलामा भी खटास भुलाकर अरसे बाद करमापा के गुरु के बौद्ध मठ में गए थे।
करमापा और ताई सितु रिंपोंछे
बौद्ध धर्म में चार सेक्ट (मठ एवं स्कूल) होते हैं। चारों सेक्ट के अलग अलग मठाधीश होते हैं। इनमें से एक काग्यू सेक्ट भी है। काग्यू सेक्ट के मठाधीश (प्रमुख) करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे हैं। यह 17वें करमापा हैं। दलाईलामा के बाद करमापा सबसे बड़ी पदवी मानी जाती है। करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे 5 जनवरी 2000 को तिब्बत से भागकर धर्मशाला पहुंचे थे।
करमापा के गुरु छोटी उम्र में ही भट्टू मठ में आ गए थे। वर्ष 1992 में 16वें करमापा के प्रीडिक्शन लेटर को प्रस्तुत करके उग्येन त्रिनले दोरजे को उन्होंने 17वां करमापा घोषित किया था। लेकिन, विडंबना यह थी कि जिसने करमापा घोषित किया, वहीं अपने गुरु से पास रहकर भी आज तक नहीं मिल पाया था।